गुरुवाणी/ केन्द्र
युवाचार्य के प्रति हो उचित विनय का व्यवहार : आचार्यश्री महाश्रमण
जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अधिशास्ता, अखण्ड परिव्राजक युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने लाडनूं सुधर्मा सभा में चतुर्विध धर्मसंघ को उत्तरज्झणाणि आगम के माध्यम से निर्धारित विषय ‘असभ्य वाणी से बचें’ पर पावन प्रतिबोध प्रदान किया। आचार्य प्रवर ने इस दौरान देशाटन के लाभ बताने के साथ-साथ धर्मसंघ में 'युवाचार्य पद' की गरिमा, विनय और मर्यादा को लेकर विशेष मार्गदर्शनात्मक पाथेय प्रदान किया।
देशाटन से बढ़ता है अनुभव, एक जगह जमकर रहने से आ सकती है शिथिलता–आचार्य प्रवर ने साधु जीवन में निरंतर गतिशीलता का महत्व समझाते हुए कहा।
१. विहार और धर्म प्रचार : देशाटन (विहार यात्रा) करने से धर्म का व्यापक प्रचार होता है, दीक्षाओं में वृद्धि होती है और नए परिवेश व लोगों से मिलने के कारण साधु का अनुभव बढ़ता है।
२. मर्यादा का पालन : हमारे साधु समुदाय में सामान्यतया लगातार दो चातुर्मास एक जगह करना विहित नहीं है (वृद्धावस्था या शारीरिक अक्षमता जैसी विशेष स्थिति अलग है)। एक जगह लंबे समय तक रहने से संग, मोह, राग और परिचय बढ़ता है, जिससे आचार में शिथिलता आ सकती है। साधु को हिंस्र पशुओं जैसी कठिनाइयों का सामना करते हुए भी निर्भीक होकर यात्रा करते रहना चाहिए।
वाणी होनी चाहिए 'शुगर कोटेड', कठोर वचनों को भी शांति से सहें– भाषा विवेक पर बोध देते हुए शांतिदूत ने फरमाया।
१. वाणी का संयम : कोई कठोर वचन या कुवचन भी बोल दे, तो भी साधु को असभ्य वाणी से बचना चाहिए। स्वयं पर संयम रखना और अनाक्रोशपूर्ण भाषा बोलना ही बड़ी बात है। साफ-साफ कहने वाले को साफ-साफ सुनने की क्षमता भी रखनी चाहिए।
२. विष या अमृत : हमारी भाषा अमृत भी बन सकती है और विष भी। साधु की भाषा मीठी और 'शुगर कोटेड' होनी चाहिए। यथार्थ भी द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव देखकर बोलना चाहिए, लेकिन अयथार्थ (झूठ) को शुगर कोटेड करके भी कभी नहीं बोलना चाहिए। मर्मभेदी बातें कहकर किसी को दुःखी न करें।
युवाचार्य के प्रति विनय- व्यवहार :
संघीय मर्यादा के ९ अचूक सूत्र– आचार्यश्री ने स्पष्ट फरमाया कि धर्मसंघ में युवाचार्य का स्थान आचार्य के पश्चात द्वितीय होता है, अतः उनके प्रति प्रोटोकॉल का पालन संघीय व्यवस्था का अनिवार्य हिस्सा है। इसके लिए उन्होंने निम्न मार्गदर्शन दिया।
१. अमृत का प्याला : युवाचार्य किसी त्रुटि पर अंगुली निर्देश करें या उलाहना दें, तो आक्रोशित होने के स्थान पर समता रखनी चाहिए और उस सीख को “अमृत का प्याला” मानकर स्वीकार करना चाहिए। २.वंदन का नियम: बड़ों को चौबीस घंटे में एक बार वंदना करना व्यवहार-प्रशिक्षण का भाग है, किंतु यह अपेक्षा नहीं रखनी चाहिए कि युवाचार्य स्वयं प्रत्येक संत के पास जाकर वंदना करें।
३. सामूहिक वंदन की छूट : संतों की अधिक संख्या होने पर युवाचार्य एक स्थान पर बैठकर भी बड़ों का नाम लेकर वंदन कर सकते हैं।
४. मार्ग की मर्यादा : यदि मार्ग में अथवा किसी गली में युवाचार्य सामने से आते हुए दिखाई दें, तो छोटे संतों को नीचे बैठकर वंदना करनी चाहिए।
५. मंत्रणा की गोपनीयता: आचार्य और युवाचार्य के मध्य होने वाली मंत्रणाओं को पूर्णतः गोपनीय रखना चाहिए तथा किसी भी निर्णय को सार्वजनिक घोषणा से पूर्व प्रसारित नहीं करना चाहिए।
६. कागजातों की मर्यादा : युवाचार्य की डायरी अथवा अन्य निजी कागजात को उनकी अनुपस्थिति में देखना गंभीर प्रमाद है, इससे हर हाल में बचना चाहिए।
७. विहार का औचित्य : युवाचार्य प्रत्येक संत को विहार के समय पहुँचाने जाएँ, यह आवश्यक नहीं है। इस विषय में द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव के अनुसार औचित्य का विचार किया जाना चाहिए।
८. अविचलित मन : गुरु अथवा युवाचार्य द्वारा अनुशासित किए जाने पर मन को विचलित नहीं करना चाहिए तथा शासन में दृढ़ता बनाए रखनी चाहिए।
९. विनय का भाव : अपने से बड़ों के प्रति विनय का भाव हमेशा बना रहे, इसी के अनुरूप वंदना-व्यवहार रखना चाहिए।