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कोहिनूर से भी कीमती हैं साधु के 'पांच महाव्रत' : आचार्यश्री महाश्रमण
जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने ‘पांच महाव्रतों की आराधना’ पर चतुर्विध धर्मसंघ को पावन प्रतिबोध प्रदान किया।
दंड संहिता और कर्म फल का सिद्धांत : खुद ही भुगतना होगा फल–आचार्य प्रवर ने दुनिया की अदालती व्यवस्था और कर्मों के अटूट सिद्धांत को जोड़ते हुए गहरा बोध दिया।
१. व्यवस्था और न्याय : दुनिया में दंड संहिता चलती है जिसकी अपनी व्यवस्था होती है कि किस अपराध पर किस प्रकार का दंड दिया जाए। साधु समुदाय में भी द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव को यथायोग्य देखकर अपराध की स्थिति के अनुसार दंड व प्रायश्चित का निर्धारण किया जाता है।
२. कर्मों की कोर्ट : राष्ट्र की लोकतंत्रात्मक या राजतांत्रिक व्यवस्था में भी अपराध करने वालों के लिए दंड का प्रावधान होता है। इसी प्रकार, आदमी को अपने शुभ और अशुभ कर्मों का फल स्वयं ही भोगना होता है। शुभ कर्मों का फल शुभ रूप में और पाप कर्मों का फल अशुभ रूप में प्राप्त होता है।
पांच महाव्रत बनाम भौतिक दुनिया : मेरु पर्वत उठाने जैसी बड़ी साधना– शांतिदूत ने आगम के प्रमाण और सुंदर उपमाओं के माध्यम से महाव्रतों की महत्ता को रेखांकित किया।
१. असली हीरे : साधु के लिए पांच महाव्रतों की पालना व आराधना काम्य है। दसवै-आलियं में सर्व प्राणातिपात, मृषावाद, अदत्तादान, मैथुन और परिग्रह विरमण के रूप में ये पांच महाव्रत बताए गए हैं। इन्हें संक्षिप्त रूप में उत्तराध्ययन में अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह के नाम से वर्णित किया गया है, इन पांच महाव्रतों को पांच हीरों के रूप में देखा जा सकता है जिनके सामने दुनिया के हीरे तुच्छ हैं।
२. मेरु पर्वत का भार : कहा गया है कि पांच महाव्रतों को स्वीकार करना मानों मेरु पर्वत को अपने हाथ में ले लेना है। इस भार को वहन करने वाले साधु व चरित्रात्मा दुनिया के लिए वंदनीय बन जाते है।
महाव्रतों का सूक्ष्म विश्लेषण : सत्य और ब्रह्मचर्य में कोई अपवाद नहीं- पूज्य प्रवर ने साधु जीवन की मर्यादा और गृहस्थों के लिए अणुव्रत का मार्ग स्पष्ट किया।
१. मर्यादा और अपवाद : पांच महाव्रतों में अहिंसा व अपरिग्रह महाव्रत अलग कोटि के और शेष तीन महाव्रत अलग रूप के होते हैं। कई व्यावहारिक परिस्थितियों में साधु से द्रव्य हिंसा हो सकती है; जैसे विहार के समय बरसात आने पर अप्काय के जीवों की हिंसा संभव है, यद्यपि यह भाव हिंसा नहीं है। इसी प्रकार अपरिग्रह महाव्रत में भी धर्माेपकरण की कुछ वस्तुएं मान्य हैं, परन्तु सत्य, अचौर्य और ब्रह्मचर्य महाव्रतों में कोई भी अपवाद मान्य नहीं है।
२. अनावश्यक संग्रह से बचें : साधना को निर्मल बनाने के लिए साधु-साध्वियों को अनावश्यक संग्रह से बचकर अल्पोपधि होने का प्रयास करना चाहिए।
३. गृहस्थों को अणुव्रत : अहिंसा, संयम व तप ही साधु की वास्तविक संपत्ति और सबसे बड़ा धन है। गृहस्थों से यदि इन महाव्रतों का पालन न हो सके, तो उन्हें पांच अणुव्रतों का पालन कर छोटे व्रतों को जीवन में उतारने का प्रयास करना चाहिए।