राजनीति पर धर्म का 'ब्रेक' ही 'रामराज्य' की पहली शर्त : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

लाडनूं। 21 जून, 2026

राजनीति पर धर्म का 'ब्रेक' ही 'रामराज्य' की पहली शर्त : आचार्यश्री महाश्रमण

जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अनुशास्त्रा, महातपस्वी, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण जी ने जैन विश्व भारती के सुरम्य परिसर में “अनाथों के नाथ बनो” विषय पर उत्तरज्झयणाणि आगम में वर्णित राजा श्रेणिक व अनाथी मुनि के संवाद के माध्यम से अमृत देशना प्रदान की। अन्तरराष्ट्रीय योग दिवस (21 जून) के विशेष मौके पर परिसर में आयोजित सामूहिक योगाभ्यास कार्यक्रम में भी पूज्य प्रवर ने स्वयं पहुंचकर उपस्थित जनमेदिनी को योग और स्वस्थ जीवन की पावन प्रेरणा दी।
राजनीति और धर्मनीति का संतुलन: स्वार्थ और भेदभाव से मुक्त हो सिस्टम– आचार्य प्रवर ने राजनीति के क्षेत्र के महानायक राजा श्रेणिक और धर्म जगत के महान निर्ग्रन्थ अनाथी मुनि के मिलन को रेखांकित करते हुए देश की शासन व्यवस्था पर बोध दिया।
१. धर्म के विधान से चले शासन : राष्ट्र के संचालन के लिए राजनीति आवश्यक है, लेकिन राजनीति हमेशा धर्म, अहिंसा, नैतिकता, सद्भावना और निष्पक्षता के सिद्धांतों से संचालित होनी चाहिए। व्यक्तिगत स्वार्थ, अनैतिकता और पक्षपात लोकतंत्र को कमजोर करते हैं।
२. भेदभाव का हो अंत : शासन-प्रशासन में जाति, मजहब या आर्थिक असमानता के आधार पर नागरिकों के साथ कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए। यदि समाज में कोई अपराध होता है, तो अपराधी को कानून के दायरे में सजा देने का कार्य सिर्फ और कोर्ट (न्यायपालिका) का है।
लोकतंत्र बनाम राजतंत्र: ऐशो-आराम में डूबने वाले राजाओं पर सीधा प्रहार– शांतिदूत ने संस्कृत साहित्य का उदाहरण देते हुए सत्ता के नशे में चूर रहने वाले कप्तानों को आईना दिखाया।
१. प्रजा की सेवा ही एकमात्र लक्ष्य : चाहे लोकतांत्रिक प्रणाली हो या प्राचीन राजतंत्रीय व्यवस्था, दोनों का एकमात्र लक्ष्य प्रजा को सुखी रखना, देश में अच्छी व्यवस्था बनाना और राष्ट्र का विकास करना है। पहले चक्रवर्ती, वासुदेव और प्रतिवासुदेव की व्यवस्था थी, जबकि आज जनता के द्वारा, जनता के लिए और जनता पर शासन की लोकतांत्रिक प्रणाली लागू है।
२. बकरी के गले के स्तन जैसा जीवन : जो राजा या नेता पद पर आने के बाद जनता की सुख-सुविधाओं को भूलकर सिर्फ अपने ऐशो-आराम में डूबा रहता है, उसका जन्म संस्कृत साहित्य के अनुसार उसी प्रकार निरर्थक है, जैसे बकरी के गले में लटका हुआ स्तन (जिसका कोई उपयोग नहीं होता)। अच्छे लीडर्स को हमेशा जनता की ज़रूरतों का आकलन कर उन्हें पूरा करना चाहिए।
अहिंसा महाव्रत: ऐसे बनें बेजुबानों और अनाथों के नाथ– पूज्य प्रवर ने अध्यात्म और व्यावहारिक जीवन को जोड़ते हुए कहा कि धर्मनीति का मूल मंत्र ही अनाथों का नाथ बनना है। इसके लिए इंसान को षट्‌जीव निकाय के जीवों की हिंसा का पूरी तरह त्याग करना होगा।
जो साधु अहिंसा के महाव्रत का पालन करते हैं, वे सृष्टि के समस्त बेजुबान जीवों को अभयदान देकर वास्तव में अनाथों के सच्चे नाथ बन जाते हैं।