पद विसर्जन और वत्सलता के युगपुरुष थे आचार्य तुलसी : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

लाडनूं। 23 जून, 2026

पद विसर्जन और वत्सलता के युगपुरुष थे आचार्य तुलसी : आचार्यश्री महाश्रमण

जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, अहिंसा यात्रा प्रणेता, शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी ने सुधर्मा सभा में ‘दयानुकंपी रहें’ पर चतुर्विध धर्मसंघ को पावन पाथेय प्रदान किया।
आचार्य भिक्षु के आलोक में दया की परिभाषा: पापों से रक्षा ही अहिंसा– आचार्य प्रवर ने धर्मसंघ के आद्य प्रवर्तक के सिद्धांतों और आत्मा की शुद्धि को जोड़ते हुए गहरा बोध दिया।
१. संकल्प की भावना : आचार्य श्री भिक्षु ने दया के बारे में बताया कि जीव अपने आयुष्य बल से जी रहा है, उसमें हमारी कोई दया नहीं है। कोई जीवों को मारता है तो वह हिंसा
का भागीदार है। किसी जीव को नहीं मारना और ऐसा संकल्प करने की जो भावना है, वह अपने आप में अहिंसा और दया है।
२. पाप आचरण से रक्षा : अपने आप को और दूसरों को पाप आचरणों से बचाना तथा सदुपदेश देकर पाप का परित्याग करा देना भी बहुत बड़ी दया है। आगम के अनुसार साधु में जीवों के प्रति दया का अनुकंपन और स्पंदन होना चाहिए कि कोई जीव मर न जाए। साधु जीवन की मर्यादा : नवनीत जैसा कोमल हृदय और सहज शांति– शांतिदूत ने संतत्व के वास्तविक स्वरूप और अभयदान की महत्ता को रेखांकित किया।
१. अभयदानी संत : साधु का हृदय नवनीत के समान कोमल होना चाहिए। वह तन, मन और वचन से किसी को दुःख नहीं देता, यही बड़ी दया है। साधु तीन करण और तीन योग से सभी प्रकार की हिंसा का परित्याग करने के कारण सृष्टि के लिए अभयदानी होता है।
२. सहज समता का भाव : संत वह होता है जो शांत होता है; जिसमें उग्रता है, वहां संतता में कमी है। साधु का मुख प्रसन्नता का घर होता है, वे क्रोधी नहीं होते। उनके चेहरे पर सदैव सहज शांति और सहज समता का भाव झलकता है। सामर्थ्य होने पर भी क्षमा और शांति रखना ही बड़ी बात है।
आचार्य तुलसी का महाप्रयाण दिवस: विसर्जन और अमृत वाणी का स्मरण– पूज्य प्रवर ने नवम अधिशास्ता गुरुदेव तुलसी के ऐतिहासिक अवदानों और उनके बाहरी व आंतरिक व्यक्तित्व का भावपूर्ण स्मरण किया।
१. ऐतिहासिक नेतृत्व : आज आचार्य श्री तुलसी का महाप्रयाण दिवस है, जिसे २९ वर्ष पूर्ण होने वाले हैं।
वे धर्मसंघ में सबसे छोटी उम्र में युवाचार्य व आचार्य बने, सर्वाधिक समय तक पद पर रहे और एकमात्र ऐसे आचार्य थे जिन्होंने स्वयं अपने पद का विसर्जन कर दिया था। वर्ष 1989 के योगक्षेम वर्ष में युवाचार्य महाप्रज्ञ जी के प्रवचन के बाद आचार्य तुलसी उसका उपसंहार करते थे, जो आज भी अमृत वाणी के पास सुरक्षित है।
२. श्रद्धांजलि और प्रदर्शनी : इस विशेष मौके पर गंगाशहर के बोथरा भवन से तेरापंथ न्यास भवन तक की उनकी अंतिम चर्या को याद किया गया। गुरुदेव तुलसी के महाप्रयाण दिवस के संदर्भ में गंगाशहर से लगभग 2000 श्रद्धालु आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में उपस्थित हुए। इस दौरान गुरुदेव के जीवन काल पर आधारित एक विशेष प्रदर्शनी भी लगाई गई, जिसका आचार्य प्रवर ने गहन अवलोकन किया।