दिमाग की ओवरथिंकिंग और स्ट्रेस को डिलीट करना ही असली ध्यान है : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

लाडनूं। 18 जून, 2026

दिमाग की ओवरथिंकिंग और स्ट्रेस को डिलीट करना ही असली ध्यान है : आचार्यश्री महाश्रमण

जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी ने जैन विश्व भारती के सुधर्मा सभा परिसर में चतुर्विध धर्मसंघ को “अध्यात्म - ध्यान योग” विषय पर उत्तरज्झयणाणि आगम के माध्यम से अमृत देशना प्रदान की। पूज्य प्रवर ने चंचल मन को वश में करने और आधुनिक दौर में कषायों के नियंत्रण का सबसे व्यावहारिक वैज्ञानिक मार्ग समझाया।
शुभ योग की महिमा: एक साथ शुरू होते हैं पुण्य और निर्जरा– आचार्य प्रवर ने कर्मों के आगमन (आश्रव) और आत्मा की शुद्धि के अंतर्संबंधों को बेहद सूक्ष्म रूप से स्पष्ट किया।
१. अशुभ द्वारों पर लगाएं ताला : मिथ्यात्व, अव्रत, प्रमाद और कषाय—ये साढ़े चार आश्रव पूरी तरह अप्रशस्त यानी अशुभ द्वार हैं, जिन्हें साधक को हमेशा रोकना चाहिए।
२. शुभ योग की दो शाखाएं : शुभ कर्मों का आना शुभ योग है। जब जीवन में शुभ योग जागता है, तो वहां से दो धाराएं एक साथ निकलती हैं—पहली कर्मों के विलय (निर्जरा) की और दूसरी पुण्य बंध की। पुण्य बंध पहले होता है और निर्जरा बाद में, हालांकि दोनों कार्यों की शुरुआत एक ही समय पर होती है। सिद्धावस्था और चौदहवें गुणस्थान में पहुंचकर आत्मा इस प्रशस्त आश्रव को भी पार कर पूर्णतः अयोग (परम शांत) स्थिति में लीन हो जाती है।
मन की स्थितियां : जबरदस्ती का दमन साधना नहीं – शांतिदूत ने आज के युवाओं और पाठकों को मन की व्यग्रता से उबरने का तीखा सूत्र दिया।
१. एकाग्रता ही असली ध्यान : मन जब विभिन्न आलंबनों पर भटकता है, तो वह व्यग्र मन की चंचलता है। साधना के बल पर जब मन को एक ही केंद्र पर टिका दिया जाता है, तो वह एकाग्रता बनती है। आर्त और रौद्र ध्यान अशुभ हैं, जबकि धर्म और शुक्ल ध्यान आत्मा को ऊँचा उठाते हैं।
२. चेतना का निग्रह : खुद को बाहर से जबरदस्ती दबाना या दमन करना सही मार्ग नहीं है। असली साधना वह है जब व्यक्ति अपनी आंतरिक जागृत चेतना से स्वयं पर शासन (प्रशस्त दम) करना सीख जाता है। योग के माध्यम से खुद को संयमित करना बहुत बड़ी उपलब्धि है।
ध्यान के व्यावहारिक प्रयोग : आहार और निद्रा के समय रखें स्थिरता– पूज्य प्रवर ने आम जनता के लिए ध्यान को बेहद सरल और व्यावहारिक रूप में प्रस्तुत करते हुए कहा कि द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव की अनुकूलता को देखकर इंसानों को ध्यान का नियमित अभ्यास करना चाहिए। जहाँ भी अनुकूल स्थान और समय मिले, व्यक्ति को थोड़ी देर स्थिर होकर अंतर्यात्रा करनी चाहिए। यहाँ तक कि रोज़ाना आहार ग्रहण करते समय भी चित्त की स्थिरता का प्रयोग किया जा सकता है और रात को बिस्तर पर सोने जाने से ठीक पहले भी ध्यान का बेहतरीन प्रयोग करके कषायों को उपशांत किया जा सकता है।