स्वाध्याय
धर्म है उत्कृष्ट मंगल
कुछ बच्चे कबूतर को उड़ाते हैं। कबूतर एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाकर बैठ जाता है। फिर वहां से भी उसे उड़ाया जाता है। इस प्रकार बच्चे बार-बार कबूतर को उड़ाते हैं और एक खेल-सा खेलते हैं। बच्चों के लिए तो वह मनोविनोद हो गया, किन्तु कबूतर को कितनी तकलीफ होती होगी।
इसी प्रकार कुछ पक्षी बैठे हैं, चुगा खा रहे हैं। उनके बीच में अचानक कोई व्यक्ति जाकर खड़ा हो जाता है तो पक्षी उड़ जाते हैं, उन्हें तकलीफ हो सकती है। वायुकाय की हिंसा भी हो सकती है। पक्षियों के मन में भय पैदा हो सकता है। वे भयभीत होकर उड़ते हैं। इस तरह अनेक प्रकार से प्राणी को कष्ट देना जीव-हिंसा का काम हो जाता है।
प्राचीनकाल में एक युवक बाहर पढ़कर आया था। मां ने कहा-बेटा! पहले स्नान कर लो। बाद में भोजन कर लेना। वह स्नान करने के लिए जिस स्थान पर गया, वहां चींटियां बहुत थीं। माँ ने दूसरे स्थान की ओर संकेत करते हुए कहा-बेटा! तुम उधर नहा लो, वहां चींटियां नहीं हैं। बेटे ने कहा-मैं तो यहीं स्नान करूंगा। उसने वहीं स्नान किया। बेचारी कितनी चींटियां पानी में डूबकर मर गई होंगी। यदि वह और कहीं स्नान कर लेता तो चींटियां नहीं मरतीं। मगर उसने चींटियों की परवाह नहीं की। क्योंकि उसके मन में प्राणियों के प्रति निरनुकम्पा का भाव था। इस प्रकार जो आदमी छोटी-छोटी बातों में अनावश्यक प्राणियों की हिंसा करता है, वह अल्प आयुष्य के बंधन का एक रास्ता तैयार कर लेता है।
अल्प आयुष्य के बंधन का दूसरा कारण है-झूठ बोलना। किसी आदमी को तो कारणवश, परिस्थितिवश झूठ बोलना पड़ता है और कोई व्यक्ति यूं ही बात-बात में, हंसी-मजाक में झूठ बोल देता है। कोई लोभ के कारण, कोई गुस्से में आकर, कोई भय के कारण भी झूठ बोल देता है। वह झूठ बोलकर अल्प आयुष्य का बंधन कर सकता है। इसलिए जितना संभव हो सके उतना झूठ से बचने का प्रयास करना चाहिए। झूठ बोलने से आत्मा मलिन होती है। जिसको ज्यादा झूठ-कपट करने की आदत होती है, वह तिर्यंच गति का आयुष्य भी बांध सकता है।
अल्प आयुष्य के बंधन का तीसरा कारण है-गृहस्थ के द्वारा साधु को अकल्पनीय आहार आदि देना। कोई व्यक्ति साधु को जानबूझकर छल-कपट से सचित्त वस्तु बहरा दे तो उससे भी अल्प आयुष्य का बंधन होता है। जैसे, कोई संत अपने संसारपक्षीय ज्ञातिजनों के घर गोचरी के लिए जाता है और उन ज्ञातिजनों को भी यह ज्ञात होता है कि आज हमारे घर नातीले संत गोचरी आने वाले हैं तो वे कोई विशेष चीज बाजार से खरीदकर ले आते हैं, मिठाई आदि बना लेते हैं या उनको जो चीज पसंद है वह चीज बना लेते हैं। संत आकर पूछते हैं-यह किसके लिए बनाया है? तब वे झूठ बोल देते हैं कि हमारे लिए ही बनाया है। इस प्रकार छल-कपट के साथ अशुद्ध आहार बहराना, अकल्पनीय आहार बहराना अल्प आयुष्य का निमित्त बन जाता है, कारण बन जाता है। इसलिए साधु को छल-कपटपूर्वक, जानबूझकर उनके लिए बनाकर, मंगवाकर, खरीदकर आहार नहीं बहराना चाहिए। यदि कभी किसी कारणवश ऐसा हो भी जाए तो कम से कम झूठ तो नहीं बोलना चाहिए। जो बात है वह साफ-साफ बता देनी चाहिए कि महाराज ! हमने बनाया या मंगवाया तो आपके लिए ही है। ऐसा स्पष्ट कहकर पाप से बचने का प्रयास करना चाहिए। इस प्रकार शास्त्रकार ने अल्प आयुष्य बंधन के तीन कारण बताए हैं।
तीन उपकारी पुरुष
ठाणं में बताया गया है– तओ रुक्खा पण्णत्ता, तं जहा-पत्तोवगे, पुप्फोवगे, फलोवगे। एवामेव तओ पुरिसजाता पण्णत्ता, तं जहा-पत्तोवारुक्खसमाणे, पुप्फोवारुक्खसमाणे, फलोवारुक्खसमाणे। 3/28
वृक्ष तीन प्रकार के होते हैं-
1. पत्रों वाले,
2. पुष्पों वाले,
3. फलों वाले।
इसी प्रकार पुरुष भी तीन प्रकार के होते हैं-
1. कुछ पुरुष पत्रों वाले वृक्षों के समान होते हैं-अल्प उपकारी,
2. कुछ पुरुष पुष्पों वाले वृक्षों के समान होते हैं-विशिष्ट उपकारी,
3. कुछ पुरुष फलों वाले वृक्षों के समान होते हैं-विशिष्टतर उपकारी।