स्वाध्याय
श्रमण महावीर
'वह अभी रास्ते में चल रहा है। बहुत दूर नहीं है। तुम अभी-अभी थोड़ी देर में उससे मिलोगे।'
'भन्ते! क्या मेरा मित्र आपका शिष्य बनेगा?'
'हां, बनेगा।'
भगवान यह कह रहे थे, इतने में स्कंदक सामने आ गया। गौतम ने स्कंदक को निकट आते हुए देखा। वे तत्काल उठे और स्कंदक के सामने जाकर बोले - 'स्वागत है, स्कंदक! सुस्वागत है, स्कंदक! अन्वागत है, स्कंदक! स्वागत-अन्यागत है, स्कंदक!' गौतम के मुक्त व्यवहार ने स्कंदक को मैत्री-सूत्र में बांध लिया।
३. कृतिंगला के पास श्रावस्ती नगरी थी। वहां परिव्राजकों का एक आवास था। उसका आचार्य था गर्दभाल । स्कंदक उनका शिष्य था। उस श्रावस्ती में पिंगल नाम का निर्गन्थ रहता था। एक दिन वह परिव्राजक-आवास में चला गया। उसने स्कंदक से पूछा–
१. लोक सांत है या अनन्त ?
२. जीव सांत है या अनन्त ?
३. मोक्ष सांत है या अनन्त ?
४. मुक्त-आत्मा सांत है या अनन्त ?
५. किस मरण से मरता हुआ जीव जन्म-मरण की परम्परा को बढ़ाता है या घटाता है?
स्कंदक का मन सन्देह से आलोड़ित हो उठा। वह इन प्रश्नों का उत्तर नहीं दे सका। पिंगल ने इन प्रश्नों को फिर दोहराया। स्कंदक फिर मौन रहा। पिंगल उससे समाधान लिये बिना लौट आया।
परिव्राजक– आवास में मुक्त गमन और मुक्त आगमन और मुक्त प्रश्न हृदय ही मुक्तता से ही सम्भव था।
स्कंदक ने सुना, भगवान महावीर कृतिगला से विहार कर श्रावस्ती आ गए हैं। उसने सोचा- मैं भगवान महावीर के पास जाऊं और इन प्रश्नों का उत्तर प्राप्त करूं। उसे भगवान महावीर के पास जाने और प्रश्नों का उत्तर पाने में कोई संकोच नहीं था। वह मुक्तभाव से भगवान महावीर के पास गया। भगवान ने मुक्तभाव से स्कंदक को उन प्रश्नों के उत्तर दिए। भगवान ने कहा- 'स्कंदक ! द्रव्य और क्षेत्र की दृष्टि से लोक सांत है, काल और पर्याय की दृष्टि से लोक अनन्त है। इसी प्रकार जीव, मोक्ष और मुक्त-आत्मा भी द्रव्य और क्षेत्र की दृष्टि से सांत है, काल और पर्याय की दृष्टि से अनन्त है। मरण दो प्रकार का होता है-बाल मरण और पंडित मरण। बाल मरण से मरने वाला जीव जन्म-मरण की परम्परा को बढ़ाता है और पंडित मरण से मरने वाला उसे घटाता है।'
भगवान के उत्तर सुन स्कंदक परिव्राजक का मानस-चक्षु खुल गया। उसके मुक्त मानस ने स्वीकृति दी और वह महावीर के पास दीक्षित हो गया।
४. भगवान महावीर राजगृह के गुणशीलक चैत्य में विहार कर रहे थे। उस चैत्य के आसपास अनेक अन्यतीर्थिक परिव्राजक रहते थे। एक दिन कालोदायी, शैलोदायी आदि कुछ परिव्राजक परस्पर बातचीत करने लगे। उनके वार्तालाप का विषय था भगवान महावीर के पंचास्तिकाय का निरूपण। वे बोले- 'श्रमण महावीर पांच अस्तिकायों का निरूपण करते हैं- धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय, आकाशास्तिकाय, पुद्गलास्तिकाय, जीवास्तिकाय । इनमें पहले चार अस्तिकायों को वे अजीव बतलाते हैं और पांचवें अस्तिकाय को जीव । चार अस्तिकायों को वे अमूर्त बतलाते हैं और पुद्गलास्तिकाय को मूर्त। यह अस्तिकाय का सिद्धान्त कैसे माना जा सकता है?
परिव्राजकों का वार्तलाप चल रहा था। उस समय उन्होंने श्रमणोपासक मदुक को गुणशीलक चैत्य की ओर जाते हुए देखा। एक परिव्राजक ने प्रस्ताव किया- 'श्रमण महावीर पंचास्तिकाय का प्रतिपादन करते हैं, यह हमें भली-भांति ज्ञात है। फिर भी अच्छा है कि मदुक से इस विषय में और जानकारी प्राप्त कर लें। 'इस प्रस्ताव पर सब सहमत होकर वे मदुक के पास गए। उन्होंने कहा- 'मदुक ! तुम्हारे धर्माचार्य श्रमण महावीर पंचास्तिकाय का प्रतिपादन करते हैं। उनमें चार अजीव हैं और एक जीव। चार अमूर्त हैं और एक मूर्त ! मदुक ! अस्तिकाय प्रत्यक्ष नहीं है, अतः उन्हें कैसे माना जा सकता है?' मद्दक ने उन परिव्राजकों से कहा- 'जो क्रिया करता है, उसे हम जानते-देखते हैं और जो क्रिया नहीं करता, उसे हम नहीं जानते-देखते।'