संबोधि

स्वाध्याय

– आचार्यश्री महाप्रज्ञ

संबोधि

'सोहं' का जप 'सो' का कण्ठ चक्र पर 'हं' का आज्ञाचक्र पर और 'म्' का सहस्रार चक्र पर तीनों समय जप करना चाहिए। इससे अंतर्मन और सुषुप्त मन जागृत होते हैं।
इस प्रकार अनेक मंत्र हैं। उन सबका उल्लेख संभव नहीं। साधक स्वयं अपनी रुचि के अनुसार या योग्य व्यक्ति के परामर्श से उन्हें ग्रहण करे।
मंत्र साधना की एक सरल विधि को और अपने ध्यान में रखें। वह इस प्रकार
है-समय आधा घण्टे से एक घण्टे, तीनों समय, एकांत में। जिस मंत्र को सिद्ध करना चाहो उसे सुनहरे प्रकाश में हृदय में लिखा हुआ देखो। उच्चारण करना चाहो तो कर सकते हो। दृष्टि लक्ष्य को न छोड़े। एक महीने के पश्चात् मंत्राक्षर मिटते प्रतीत होंगे, दिव्य प्रकाश कभी-कभी सन्मुख आता प्रतीत होगा। कुछ दिन बाद अक्षर लुप्त हो जायेगा, केवल हृदय तेज से भरा जान पड़ेगा। उस तेज में एक मूर्ति की झलक
आती जान पड़ेगी। यह मंत्र के देवता का रूप होता है। अभ्यास से और अधिक साफ होगी। देवमूर्ति प्रत्यक्ष सामने आ खड़ी हो तो प्रश्नों का उत्तर देगी, सहयोग करेगी। अनुष्ठान पूरा हो गया।
रूपस्थ ध्यान
रूपस्थ ध्यान का विषय है-दृश्य पदार्थ जो रूपवान्-आकृतिवान् है। जिसे साकार ध्यान भी कहा गया है। दृश्य पदार्थ में ध्याता इतना एकाग्र हो जाता है कि वह द्वैत का अनुभव नहीं करता। सुकरात रात में ताराओं को देखने में इतने खो गये कि उन्हें समय का कुछ पता ही नहीं चला। लोग खोजते हुए आये और कहा कब बैठे थे, क्या देखते हो? क्या है इनमें ? सुकरात ने कहा-क्या नहीं है इनमें? काश! आंखें होतीं देखने के लिए। लुकमान हकीम के औषधि आविष्कार वृक्षों की आत्मा के साथ तादात्म्य स्थापना की ही घटना है। वृक्ष, वायु, पृथ्वी, जल सभी के पास भाषा है, किन्तु वह संवाद उसी समय हो सकता है जिस समय साधक बाहर से शून्य हो जाता है, उसके साथ एकत्व स्थापित कर लेता है।
एक घर में एक छोटे बच्चे का फोटो था। स्त्री गर्भवती हुई और उसने वैसा ही बच्चा पैदा किया। किसी ने पूछा-यह तो इस फोटो जैसा ही लगता है। मां ने कहा-मैं गर्भावस्था में इसी का ध्यान करती थी। बस यही रहस्य है। यह कोई असंभव घटना नहीं है। सब खेल ध्यान का है। जैसा आप चाहो वैसा बन सकते हो, शर्त है तीव्र ध्यान की।
प्रतिमा, इष्ट आदि पर ध्यान करना रूपस्थ ध्यान है। चित्त की एकाग्रता का यह सरल उपाय है। जैसे-जैसे वीतराग के साथ हमारा तादात्म्य होता चला जायेगा मूर्ति आकार खो जाएगा और उस भावधारा में डूबते चले जायेंगे। किन्तु यह घटना कोई एक क्षण में घटने वाली नहीं है। साधक में तीव्र अभिलाषा चाहिए। समय देना चाहिए और प्रतीक्षा करनी चाहिए। इष्ट साकार होता है।
रूपातीत
रूपातीत ध्यान के विषय में आचार्य शुक्लचन्द्र कहते हैं-रूपस्थ ध्यान में जब चित्त स्थिर हो जाता है, विकल्प विभ्रम क्षीण हो जाते हैं तब ध्याता को अमूर्त, अरूप, अजर और अव्यक्त का ध्यान प्रारंभ करना चाहिए। जो अमूर्त है वह चिदानन्दमय शुद्ध परम अविनाशी है। उस आत्मा का आत्मा के द्वारा ध्यान करना रूपातीत ध्यान है।' यह रूपातीत होते हुए भी कल्पना प्रधान तथा अमूर्त अदृश्य अवलंबन प्रधान है। इसमें ध्येय अन्य कोई न होकर आत्मा ही है। किन्तु यहां भी ध्याता ध्येय और ध्यान की त्रिपुटी बनी हुई है। जब तीनों की एकात्मकता होती है तब पूर्ण निरालंबन की स्थिति प्रकट होती है।
यह सालंबन और निरालंबन का संधि स्थान है। एक तरफ आलंबन है और दूसरी तरफ निरालंबन का प्रस्तुतीकरण है। यहां काम की पूर्णाहुति है, समस्त यौगिक विधियां शेष होती हैं। ध्यान के उपक्रमों में थका साधक विश्राम में डूबता है। यह अप्रयत्न होते हुए भी प्रयत्न, अक्रिया होते हुए भी क्रिया का वेग सर्वत्र सिमट कर स्वयं की दिशा में गतिशील हो जाता है।
इसलिए बहुत अधिक सक्रिय है। दूसरी दिशाओं में होने वाला प्रयास यहां नहीं रहता।