संस्थाएं
30वां महाप्रयाण दिवस
अध्यात्म जगत के उज्ज्वल नक्षत्र, भारतीय ऋषि परम्परा जैन परम्परा में वैडुर्यमणि, तेरापंथ धर्मसंघ को ऊचाईयां प्रदान कराने वाले, एक महान् युगपुरूष थे-आचार्य श्री तुलसी। तुलसी एक ऐसा नाम-जिनका स्मरण मात्र व्यक्ति को समाज और राष्ट्र में अपनी नई पहचान बनाने के लिए प्रेरित करती है। उनका अतिशय-वचनातिशय आभामंडल आकर्षक तथा अनिवर्चनीय आनंद देने वाला था। उनका सम्पर्क, उनके साथ वार्तालाप-संवाद करने वाला चाहे वो किसी भी सम्प्रदाय का क्यों न हो हमेशा के लिए उनके चरणों को अपने आचरण का केन्द्र बिन्दु मानने के लिए मजबूर हो जाया करता था। या यों कहा जा सकता है वो अपने दिल में तुलसी की छवि को हमेशा के लिए स्थापित कर लेता था क्योंकि उनका वरद हस्त, आत्मीय भाव, स्नेहिल दृष्टि उसके जीवन का रूपान्तरण में निमित्त बन जाता था- ऐसे थे आचार्य श्री तुलसी।
वर्तमान युग की समस्याओं का निराकरण करना वे बखूबी जानते थे। उनके बोधपाठ में व्यक्ति, समाज और राष्ट्र की हर समस्या का समाधान था। कहा जा सकता है वे समाधायक पुरूष थे। युवापीढ़ी और भावी पीढ़ी, किशोरपीढ़ी को आगे बढ़ाना, संस्कारित करना उनका ध्येय था। उनके सफल जीवन के लिए सदैव प्रयत्नशील रहते थे। युवापीढ़ी को सफल जीवन के लिए उनको अग्रिम पंक्ति में लाने के लिए कुछ टिप्स दिए। लक्ष्य निर्धारण, आत्मविश्वास, दृढ़संकल्प, सम्यक् पुरूषार्थ, सहिष्णुता, व्यसनमुक्त जीवन प्रत्येक युवा किशोर आत्मसात करे। क्योंकि आज की बाल पीढ़ी युवा पीढ़ी ही परिवार समाज और राष्ट्र का भविष्य है। राष्ट्र का उज्ज्वल भविष्य इन्हीं के मजबूत कंधों पर है। उनका कथन था धर्मसंघ को शक्तिशाली बनाने में युवक अपनी शक्ति का सम्यक् नियोजन करे। वे पदलिप्सा, महत्वाकांक्षा की दौड़ से दूर रहे। उनकी नजरों में युवाशक्ति आज फैशन और नशे की गिरफ्त से दूर रहकर ही स्वयं और समाज का भला कर सकती है।
यद्यपि वे एक सम्प्रदाय विशेष के आचार्य अवश्य थे पर उनका दूरगामी चिन्तन मानवीय धरातल पर था। इसीलिए उन्होंने न केवल जैन तेरापंथ अपितु प्रत्येक धर्म-सम्प्रदाय को सम्मुख रखकर अणुव्रत, प्रेक्षाध्यान, जीवन विज्ञान जैसे राष्ट्र विकास के अवदान देकर मानवीय एकता राष्ट्र एकता को मजबूती प्रदान की। राष्ट्र की हर इकाई को जोड़ने का सार्थक प्रयास और पुरूषार्थ किया। उनका देह तो नहीं पर उनके विचार, उनके अवदान, उनके कार्य आज भी जीवित है तो मानना होगा कि आचार्य तुलसी जिन्दा है और हमेशा जिन्दा रहेंगें। व्यक्ति हमेशा जिन्दा नहीं रहता पर उसका व्यक्तित्व, कर्तृत्व, अवदान जीवित रहते है। जो उसको भी व्यक्ति-व्यक्ति के दिलों में जीवन्तता प्रदान करते रहते है। आचार्य तुलसी के जीवन में आन्तरिक और बाह्य अनेक संघर्ष आए पर वे संघर्षों की आग में तपकर निखरते गए। तपकर ही सोना निखार को प्राप्त होता है। उसकी चमक बढ़ती जाती है। उसी तरह आचार्य तुलसी भी संघीय,
समाज और राष्ट्रीय स्तर पर संघर्षों की ताप में तपकर सदैव निखार को प्राप्त करते रहे। इसीलिए तो संघीय, सामाजिक और राष्ट्रीय स्तर अनेक सम्बोधन विशेषण प्राप्त होते रहे। और धर्मसंघ के साथ वैश्विक स्तर पर एक नई
पहचान मिली। ऐसे महामानव के बारे में जितना कहा जाए-लिखा जाए कम
ही होगा। उनकी पुण्यतिथि पर सदैव उनके द्वारा प्रशस्त मार्ग पर चलना ही उनकी पुण्य स्मृति होगी। अन्त में उनका नाम था तुलसी।
तुलसी का पौधा बड़ा ही गुणकारी होता है। वैसे ही ज्ञानवान, गुणवान, भगवान की महान आत्मा तुलसी को शत-शत नमन।