गुरुवाणी/ केन्द्र
प्रशंसा में न फूलें, उपेक्षा में न टूटें; समभाव ही सच्ची साधना : आचार्यश्री महाश्रमण
जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी ने सुधर्मा सभा में उत्तरज्झयणणि आगम के माध्यम से ''न उन्नत बनें - न अवनत'' विषय को व्याख्यायित किया। आचार्यप्रवर ने फरमाया कि निर्वाण प्राप्ति के लिए विरत होना अनिवार्य शर्त है; साधुत्व आए बिना मोक्ष मिल ही नहीं सकता। साधु का वेश, मुखवस्त्रिका और पूंजनी बाहर का साधुपन हैं जो अहिंसा की साधना में सहयोगी बनते हैं, लेकिन मूल साधुपन आत्मा के भीतर भावों और अध्यवसायों में होना चाहिए।
गुरुदेव ने इसके व्यावहारिक और आध्यात्मिक पक्षों को स्पष्ट करते हुए मुख्य बातें बताईं–
१. आत्मा ही अहिंसा-हिंसा : जो अप्रमत्त (जागरूक) है वह अहिंसक है और जो प्रमत्त (असावधान) है वह हिंसक है।
२. राग-द्वेष से मुक्ति : मोक्ष के लिएराग-द्वेष से मुक्ति अनिवार्य है। यदि यह मुक्ति हो गई तो वेश या संप्रदाय कोई भी हो, मोक्ष का द्वार खुल जाता है।
३. सरलता और ईमानदारी : साधु में छल-कपट नहीं होना चाहिए। यही ऋजुता व्यापार, लेनदेन और गृहस्थ जीवन में भी अनिवार्य रूप से अपनानी चाहिए।
न पूजा-प्रतिष्ठा में बहें, न उपेक्षा से कुपित हों:
आगे आगमकार के हवाले से शांतिदूत ने फरमाया कि महर्षि को जीवन में न तो उन्नत (अहंकारी) बनना चाहिए और न ही अवनत (हीनभावना से ग्रस्त) होना चाहिए। साधु को मार्ग पर चलते समय युग प्रमाण भूमि को देखकर चलना चाहिए।
गुरुदेव ने साधकों के लिए समता का नियम समझाया–
१. मान-सम्मान में समभाव : कितनी भी पूजा या प्रतिष्ठा मिले, साधक को कभी भी अहंकार नहीं करना चाहिए।
२. उपेक्षा पर नियंत्रण : यदि कोई वंदना न करे, तो मन में क्रोध या दुःख का भाव नहीं आना चाहिए।
३. निर्मल अध्यवसाय : भाव शुभ होने पर छोटे जीव भी आत्मा का विकास कर लेते हैं, जबकि भाव खराब होने पर दुर्गति होती है।
बालक की तरह गुरु के समक्ष स्वीकारें भूल– प्रवचन के अंतिम चरण में आचार्यप्रवर ने प्रायश्चित की महत्ता पर विशेष बल दिया। पूज्य प्रवर।ने फरमाया कि साधना के मार्ग में यदि साधु से कभी कोई गलती हो जाए, तो उसे छिपाने की बजाय गुरु के सामने पूरी निष्कपटता से रख देना चाहिए।
भूल सुधार और प्रायश्चित को लेकर आचार्यश्री की स्पष्ट प्रेरणाएं।
१. निश्छल स्वीकारोक्ति : भूल होने पर गुरु के सामने छोटे बालक की तरह सरलता से अपनी गलती मानकर यथायोग्य आलोचना और प्रायश्चित ग्रहण करना चाहिए। २.गुरु की गंभीरता: प्रायश्चित प्रदान करने वाले गुरु में भी निष्पक्षता, गंभीरता और पूर्ण विवेक संपन्नता होनी चाहिए।
३. गोपनीयता का नियम : आलोचना से जुड़ी बातों को पूरी तरह गुप्त रखना चाहिए। आवश्यकता होने पर द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव के अनुसार सक्षम साधुओं से गोपनीय परामर्श लिया जा सकता है।
'महाप्रज्ञ श्रुत-आराधना' पाठ्यक्रम और साध्वीवृंद की परीक्षा– आचार्य श्री ने चारित्रात्माओं हेतु निर्धारित 'महाप्रज्ञ श्रुत-आराधना' पाठ्यक्रम की चर्चा की, जो सात वर्षों का एक अत्यंत कठिन आगम-अध्ययन कार्यक्रम है। उन्होंने स्वयं साध्वी स्वस्तिक प्रभा और साध्वी प्रशस्त प्रभा की कठिन मौखिक परीक्षा (viva) ली, जिसमें दोनों साध्वियों ने क्रमशः 95% और 94% अंक प्राप्त कर अपनी विद्वत्ता का परिचय दिया। आचार्य श्री ने घोषणा की कि आगामी माघ शुक्ला सप्तमी को मर्यादा महोत्सव के दौरान इनका दीक्षांत समारोह आयोजित कर इन्हें डिग्री प्रदान की जाएगी।