संकटों में मेरू सी 'अडिगता' ही आपकी असली Class : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

लाडनूं। 29 जून, 2026

संकटों में मेरू सी 'अडिगता' ही आपकी असली Class : आचार्यश्री महाश्रमण

जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, महातपस्वी व युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने निर्धारित विषय ‘मेरू की तरह अकंपमान रहें’ पर उत्तरज्झयणाणि आगम के माध्यम से अमृत देशना प्रदान की।
तत्त्व विद्या और गुणस्थान: योग से अयोग की ओर बढ़ें कदम– आचार्य प्रवर ने जैन दर्शन के गूढ़ सिद्धांतों
को समझाते हुए साधना की परम स्थिति पर प्रकाश डाला।
१. गुणों का आरोह: गुणस्थानों में हमेशा आत्मा के विकास और गुणों
को देखा जाता है, कमियों को नहीं। जैसे-जैसे आश्रव (कर्मों का आना) कम होता है, वैसे-वैसे गुणस्थानों का विकास होता है और संवर (कर्मों का रुकना) बढ़ता है।
२. साधना की परम स्थिति : जैन दर्शन में योग साधना के साथ 'अयोग साधना' (मन-वचन-काया की प्रवृत्तियों को रोकना) को मोक्ष के लिए अनिवार्य माना गया है। साधना की सर्वोच्च स्थिति 14वां गुणस्थान है, जहां आत्मा मेरू पर्वत की तरह पूरी तरह स्थिर और 'अकंपमान' हो जाती है।
शत्रु से भी करें श्रेष्ठ व्यवहार, समता से सहें कष्ट– शांतिदूत ने गृहस्थों और साधकों के लिए व्यावहारिक जीवन में संतुलन बनाए रखने के व्यावहारिक सूत्र दिए। १. सहनशीलता ही साधना : गृहस्थ जीवन में परिवार के सभी सदस्यों की प्रकृति अलग होती है। परिवार चलाने के लिए सबकी सुनना, सहन करना और शांति से समझाना भी एक बड़ी साधना है। विपरीत परिस्थितियों में मौन और शांति रखना सबसे उत्तम है।
२. शत्रु भी बनेंगे मित्र : हमें सबके साथ, यहाँ तक कि शत्रु के साथ भी अच्छा व्यवहार करना चाहिए। यदि हमारा व्यवहार पवित्र है तो शत्रु भी निकट आ सकते हैं और संघ व समाज की उन्नति में सहभागी बन सकते हैं।
३. चित्त समाधि आपके हाथ : हमारी 90 प्रतिशत चित्त समाधि (मानसिक शांति) स्वयं हमारे अपने हाथ में होती है, बाहरी परिस्थितियाँ तो सिर्फ निमित्त मात्र हैं। यदि हमारा समता भाव मजबूत है, तो कोई भी संकट हमारा मानसिक संतुलन नहीं बिगाड़ सकता।
मेरू जैसी अटलता : जीवन का मूल मंत्र– पूज्य प्रवर ने संदेश दिया कि जैसे मेरू पर्वत तेज हवाओं के थपेड़ों से भी विचलित नहीं होता, वैसे ही मनुष्य को भी जीवन की कठिनाइयों और प्रतिकूलताओं में अडिग रहना चाहिए। अपने आस-पास के लोगों की कमियों को सहन करते हुए प्रेम से उनका परिष्कार (सुधार) करने का प्रयास करना चाहिए।