गुरुवाणी/ केन्द्र
मौन से आत्मिक उन्नति, ज्यादा बोलना घटाता है 'Value': आचार्यश्री महाश्रमण
जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, अखण्ड परिव्राजक, अहिंसा यात्रा प्रणेता व युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने निर्धारित विषय ‘सम्यक् भाषा प्रयोग’ पर उत्तरज्झयणाणि आगम के माध्यम से पावन पाथेय प्रदान किया।
भाषा समिति और आगम का संदेश: असावद्य और परिमित हो वाणी– आचार्य प्रवर ने जैन आगमों के आलोक में सम्यक् भाषा प्रयोग की महत्ता को रेखांकित किया।
१. दूसरी समिति : पांच समितियों में दूसरी समिति 'भाषा समिति' होती है। सम्यक् भाषा प्रयोग का दिव्य संदेश इसी भाषा समिति से प्राप्त किया जा सकता है।
२. आगम की आज्ञा : आगम में निर्देश है कि साधु सावद्य भाषा न बोले। जिस भाषा से हिंसा की प्रेरणा मिलती हो, वैसी भाषा का प्रयोग सर्वथा वर्जित है। वाणी अयथार्थ, कटु और छलपूर्ण नहीं होनी चाहिए।
३. सोच-समझकर बोलना : मनुष्य को बोलने से पहले बुद्धि से सोचना चाहिए, फिर चिंतनपूर्वक बोलना चाहिए। आगमकार ने कहा है कि हमेशा असावद्य, परिमित और समय पर ही बोलें।
वाणी के आठ सबसे बड़े दुश्मन: इन कारणों से इंसान बोलता है झूठ– शांतिदूत ने शास्त्र में वर्णित उन आठ कारणों का सूक्ष्म विश्लेषण किया, जो भाषा समिति के विरोधी तत्त्व हैं और मानवीय दुर्बलता का कारण बनते हैं।
१. क्रोध और अहंकार : आदमी गुस्से में आकर गलत या अयथार्थ बोल देता है। अहंकार के कारण भी व्यक्ति झूठ बोल देता है कि 'मेरे बराबर दुनिया में कोई धनवान या विद्वान नहीं है'।
२. माया, लोभ और भय : बात को छिपाने व कपट (माया) के कारण भी आदमी मृषा में प्रवृत्त होता है। लालच या लोभ और कभी-कभी भय के कारण भी इंसान झूठ का सहारा ले लेता है।
३. हास्य, मुखरता और विकथा: हंसी-मजाक में भी आदमी झूठ बोल देता है। जो व्यक्ति बहुत ज्यादा बातें (मुखरता) करता है, उसके मुंह से चाहे-अनचाहे असत्य निकल जाता है। मुखरता इंसान को छोटा बनाती है और मौनशीलता उन्नति कराती है।
गलती स्वीकारने का साहस और साधु की गरिमा: यथार्थभाषी ही विश्वासपात्र– पूज्य प्रवर ने भूल सुधारने वाले साहसी महापुरुषों की सराहना करते हुए संयम का मार्ग स्पष्ट किया।
१. गलती स्वीकारने का साहस : यदि भूल होने पर इंसान तत्काल सत्य बता दे तो वह उत्तम है। जो गलती होने पर पहली बार में ही अक्षरशः उसे स्वीकार कर लेते हैं, ऐसे साहसी लोग धन्य हैं।
२. साधु की भाषा का विश्वास : साधु की भाषा गरिमापूर्ण होनी चाहिए ताकि समाज उस पर पूर्ण भरोसा कर सके। यथार्थभाषी आदमी ही विश्वासपात्र बनता है और यही मार्ग मुक्ति का पोषण है।
चतुर्दशी हाजरी वाचन, बख्शीश और जैन विद्या सम्मान समारोह का भव्य आयोजन– प्रवचन के उपरांत संघ की मर्यादाओं का वाचन हुआ और मेधावी छात्र-छात्राओं का बहुमान किया गया।
१. लेखपत्र वाचन और कल्याणक बख्शीश : चतुर्दशी के संदर्भ में आचार्यश्री ने हाजरी वाचन किया। तत्पश्चात् समस्त साधु-साध्वियों ने सामूहिक लेखपत्र उच्चरित किया।
२. जैन विद्या सम्मान समारोह : समण संस्कृति संकाय (जैन विश्व भारती) के तत्वावधान में 'वरीयता गौरव' समारोह आयोजित हुआ। जैन विद्या परीक्षा (भाग 1 से 9) व विभिन्न प्रतियोगिताओं के रैंक होल्डर्स का गुरुदेव के समक्ष सम्मान किया गया।
३. पुस्तिका विमोचन व आभार : आगामी कार्यशाला हेतु 'भिक्षु दृष्टान्त' प्रश्नपुस्तिका का विमोचन हुआ। कार्यक्रम में मंत्री सलिल लोढ़ा, पोखराज डागा, मालचंद बैगानी सहित अनेक गणमान्य जनों ने विचार रखे।