असंयमी का पोषण धर्म नहीं, कर्म का सच्चा विधान जानें : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

लाडनूं। 27 जून, 2026

असंयमी का पोषण धर्म नहीं, कर्म का सच्चा विधान जानें : आचार्यश्री महाश्रमण

जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, सद्भावना, नैतिकता और नशामुक्ति के प्रेरक, महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमण जी ने योगक्षेम वर्ष प्रवचन श्रृंखला व भिक्षु चेतना वर्ष के संदर्भ में ‘अल्प पाप: बहु निर्जरा’ विषय को व्याख्यायित किया। आचार्यश्री ने फरमाया कि आगम में नव तत्त्व बताए गए हैं। जीव-अजीव को छोड़कर शेष सात तत्त्व साधना से जुड़े हैं। इन तत्त्वों को अच्छी तरह जानकर सम्यक् आचरण करने से मनुष्य मोक्ष की ओर अग्रसर हो सकता है। एक ही समय में पांच तत्त्वों का खेल: सेवा और साधना– आचार्य प्रवर ने कर्म फल के सिद्धांत और तत्त्वों की क्रियाशीलता को स्पष्ट करते हुए गहरा बोध दिया।
१. एक साथ पांच स्थितियां : मानव जीवन में एक ही समय में संवर, निर्जरा, पुण्य, पाप और आश्रव—ये पांचों चीजें एक साथ घटित हो सकती हैं। जैसे यदि कोई मुनि किसी वृद्ध साधु की वैयावृत्य (सेवा) या दर्द निवारण हेतु तेल मालिश कर रहा है, तो उस समय उसकी 'निर्जरा' हो रही है। २. संवर और पाप का बंध : चूंकि उस साधु के १८ पापों का त्याग है, अतः उसका सम्यक्त्व संवर और व्रत 'संवर' भी चालू है। सेवा कार्य से 'पुण्य' का बंध भी हो रहा है, वहीं यदि भीतर कषाय है तो कषाय आश्रव के कारण 'पिटक पाप' का बंध भी चालू है। चूंकि सेवा शुभ योग है, अतः यहाँ 'आश्रव' भी सक्रिय है। इस प्रकार पांचों तत्त्व एक साथ काम करते हैं। 'अल्प पाप: बहु निर्जरा' पर आचार्य भिक्षु का नया चिंतन– शांतिदूत ने भगवती सूत्र के आगम प्रमाणों और तेरापंथ परंपरा की विशिष्ट मान्यताओं को रेखांकित किया।
१. आगम की व्याख्या : भगवती सूत्र के आठवें शतक के छठे उद्देशक में अल्पतर पाप और बहुतर निर्जरा का प्रसंग आता है। इसके अनुसार यदि कोई गृहस्थ विषम परिस्थिति या आहार की कमी में साधु की रक्षा हेतु असूझता या आधाकर्मी आहार बहराता है, तो आगम की सामान्य भाषा कहती है कि वहां गृहस्थ को थोड़ा पाप और ज्यादा निर्जरा होती है, क्योंकि इससे संयमी साधु के शरीर की रक्षा हो रही है।
२. तेरापंथ का मतभेद और निषेध : इस व्याख्या में अन्य परंपराओं से तेरापंथ का मतभेद है। आद्य आचार्य श्री भिक्षु और श्रीमद् जयाचार्य ने इसका नया अर्थ करते हुए स्पष्ट किया कि विषम परिस्थिति में भी जानबूझकर साधु को असूझता आहार बहराना धर्म नहीं, बल्कि पाप ही है। आचार्य भिक्षु ने यहाँ 'अल्प' का अर्थ 'निषेध' के रूप में किया है, यानी यदि अनजाने या जानकारी के अभाव में गृहस्थ असूझता बहराता है, तो वहां पाप नहीं होगा, केवल निर्जरा होगी। बाकी परम सत्य केवली भगवान ही जानते हैं।
मिश्र धर्म का खंडन : असंयमी का पोषण धर्म नहीं– पूज्य प्रवर ने साधु जीवन की मर्यादा स्पष्ट करते हुए अंतिम पाथेय दिया।
१. असंयमी का पोषण स्वीकार्य नहीं : अन्य संप्रदायों में यह माना जाता है कि किसी भूखे असंयमी व्यक्ति को भोजन कराने से 'अल्प पाप, बहु निर्जरा' (मिश्र धर्म) होती है। आचार्य भिक्षु ने इस मान्यता को सिरे से खारिज किया है। तेरापंथ में मिश्र धर्म का सिद्धांत स्वीकार्य नहीं है। असंयमी को बचाने और उसके पोषण में कोई धर्म नहीं है।
२.भिक्षु विचार दर्शन का स्वाध्याय: द्वितीय ज्येष्ठ शुक्ला त्रयोदशी का भिक्षु चेतना वर्ष के अंतर्गत विशेष महत्त्व है। आचार्यश्री महाप्रज्ञ जी द्वारा लिखित पुस्तक ‘भिक्षु विचार दर्शन’ के स्वाध्याय से हम इन सिद्धांतों से अवगत हो सकते हैं।