गुरुवाणी/ केन्द्र
AI रहे मददगार, बौद्धिक क्षमता रहे दमदार : आचार्यश्री महाश्रमण
जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने प्रातः कालीन मुख्य मंगल प्रवचन में निर्धारित विषय ‘नागराज की तरह अव्यथित रहें’ पर चतुर्विध धर्मसंघ को पावन संबोध प्रदान किया।
कायरता बनाम वीरता: परिस्थितियों से डरें नहीं– आचार्य प्रवर ने कष्टों को सहने की क्षमता और कायरता के भेद को स्पष्ट करते हुए गहरा बोध दिया।
१. हार मानना कायरता : कर्म निर्जरा के लिए सहन किए जाने वाले २२ परीषह यदा-कदा साधु के सामने आ सकते हैं। परीषह आने पर एक स्थिति वह है जिसमें कायर पुरुष परिस्थितियों से खिन्न होकर हार मान जाते हैं। विपरीत हालातों में हार मानना ही कायरता है।
२. नागराज की तरह अडिग : दूसरी स्थिति यह है जिसमें व्यक्ति परीषहों से डरता नहीं है। संग्राम शीर्ष (युद्ध के मैदान) में जैसे नागराज और हस्तिराज हर प्रहार के बाद भी अविचलित रहते हैं, वैसे ही साधु को भी नागराज की तरह हर परिस्थिति में अव्यथित रहना चाहिए।
वाणी संयम और आत्म-साधना: संत वही जो शांत रहे– शांतिदूत ने कषाय की उग्रता पर प्रहार करते हुए साधक जीवन की मर्यादा को रेखांकित किया:
१. क्रोध का परिहार : कषाय की उग्रता में यदि साधु आक्रोश कर ले तो यह साधना में कमी की बात है; क्योंकि संत वही होता है जो शांत रहता है। सामने वाला कुछ भी बोल दे, साधु को गुस्सा न कर समता रखनी चाहिए।
२. वाणी पर नियंत्रण : गोचरी न हो पाने, प्यास, मच्छर काटने या किसी अज्ञानी द्वारा अपशब्द बोलने पर भी मन में द्वेष नहीं करना चाहिए। साधु अपनी वाणी पर संयम रखे और अनावश्यक बोलने से बचे।
सूर्यास्त का अलार्म और आत्मावलोकन : दैनिक जीवन का परिष्कार– पूज्य प्रवर ने साधु समुदाय एवं गृहस्थों के लिए दैनिक आत्म-निरीक्षण का मार्ग स्पष्ट किया:
१. रात का आत्म-निरीक्षण : साधु रात्रि को सोते समय आत्मावलोकन करे कि आज गुस्सा तो नहीं आया, आहार का असंयम या स्वाद-वृत्ति तो नहीं आई? प्रमाद हुआ हो तो उसका परिष्कार करे और यह चिंतन करे कि आज क्या सुकृत किया?
२. समय की जागरूकता : रोजाना सूर्यास्त हमारे जीवन का एक हिस्सा लेकर चला जाता है। अतः यह जागरूकता रहे कि आज स्वाध्याय, सेवा, परोपकार या तपस्या आदि कुछ सुकृत हुआ या नहीं? योगक्षेम वर्ष के इस स्थिर प्रवास में सभी प्रतिदिन 'नवकारसी' तप का प्रयास करें।
३. गृहस्थों को आत्म-संप्रेक्षा : गृहस्थ भी प्रतिदिन आत्मावलोकन करें कि दिनभर में कोई विशेष पाप का काम तो नहीं किया? आज सामायिक की या नहीं? इस आत्म-संप्रेक्षा से जीवन में परिष्कार का मार्ग प्रशस्त होता है।
आक्रोश में भी समता भाव और एआई (AI) का विवेकपूर्ण उपयोग– आचार्यश्री ने आगम के प्रमाण और आधुनिक तकनीक के संदर्भ में अंतिम पाथेय प्रदान किया।
१. अनुशासन में समता : आगम के अनुसार परीषह आने पर साधु नागराज की तरह सन्नद्ध रहे, कायर न बने। साधु-साध्वियों को तेज गुस्सा आना ही नहीं चाहिए, आने पर उसका परिशोधन करें। दूसरा आक्रोश करे तो भी समता रखें। गलती होने पर अनुशास्ता के दंड को भी समता भाव से सहन कर परिष्कार करना चाहिए।
२. दिमाग की सक्षमता और एआई (AI) : आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के उपयोग पर आचार्यश्री ने फरमाया कि अपेक्षानुसार तकनीक का सहयोग लिया जा सकता है, किन्तु AI के चक्कर में अपना दिमाग कमजोर नहीं पड़ना चाहिए। बौद्धिक क्षमता का विकास होता रहे।
३. साधु साध्वियों में हो रचना धर्मिता : पूज्य प्रवर ने स्पष्ट किया कि किसी भी रचना (कविता या गीतिका) में केवल व्याकरण या ढांचा होना प्रयाप्त नहीं है, उसमें 'प्राण' यानी जीवंतता ओर भाव होना आवश्यक है। एक संपादक और पाठक के पत्र-व्यवहार के दृष्टांत के बाद पूज्य प्रवर ने मुनि श्री बछराज जी द्वारा रचित गीत 'सत संगत से सुख मिलता है....' का भी स्मरण किया और उनके माध्यम से सत्संगति की महिमा पर प्रकाश डाला।
आचार्यश्री ने साध्वी प्रमुखा शासन माता कनक प्रभा जी महासती और अन्य साध्वियों की रचनात्मक क्षमता की प्रशंसा की।
पूज्य प्रवर ने फरमाया कि किस प्रकार धर्मसंघ में साधु-साध्वियों द्वारा कविता, गीतिका और संस्कृत पदों के निर्माण की एक समृद्ध परंपरा रही है और साधु-साध्वियों में मौलिक रचनाधर्मिता व सृजन क्षमता कुंठित न हो।