लक्ष्मी आए या जाए, न्याय का मार्ग कभी ना  छोड़े : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

लाडनूं। 25 जून, 2026

लक्ष्मी आए या जाए, न्याय का मार्ग कभी ना छोड़े : आचार्यश्री महाश्रमण

जैन विश्वभारती परिसर स्थित सुधर्मा सभा में आयोजित प्रातःकालीन मंगल देशना के दौरान तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अधिशास्ता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने 'प्रिय अप्रिय: सब सहें' विषय पर पावन प्रतिबोध प्रदान किया।
आध्यात्मिक तराजू: निंदा और प्रशंसा में समता ही असली धर्म–
जीवन के द्वंद्वों पर प्रहार करते हुए शांतिदूत ने फरमाया कि लाभ-अलाभ, सुख-दुख, जीवन-मरण, निंदा-प्रशंसा और मान-अपमान जैसी हर परिस्थिति में साधु को सम रहना अनिवार्य है। आचार्यप्रवर ने स्पष्ट किया।
१. गोचरी का विवेक : साधु को गोचरी (भिक्षा) में जो भी मिले, उसमें समता रखें। गोचरी न मिलने पर भी यह भाव रहे कि आज तपस्या का सर्वोत्तम अवसर मिला है।
२. आत्म-आकलन : कोई निंदा करे तो इंसान बुरा नहीं हो जाता और प्रशंसा से कोई बड़ा नहीं बनता। दूसरों के प्रमाणपत्रों के भरोसे रहने के बजाय स्वयं का आत्मालोचन करना सीखें।
लक्ष्मी का आना-जाना गौण, न्याय का मार्ग छोड़ना सबसे बड़ा पतन– श्रावक समाज को व्यावहारिक सीख देते हुए युगप्रधान ने फरमाया कि व्यापार या जीवन में लक्ष्मी (धन) का आगमन हो या वह चली जाए, समता का भाव कभी ओझल नहीं होना चाहिए। धीर पुरुष प्रतिकूलताओं के थपेड़ों में भी न्याय पथ से एक पग भी विचलित नहीं होते।
पारिवारिक शांति का सूत्र– गृहस्थ जीवन में परिवार में कोई कहना न माने या विपरीत परिस्थितियां आएं, तो मन को विचलित करने या आक्रोशित होने के बजाय आंतरिक शांति और समता में बने रहना ही असली पुरुषार्थ है।
वृद्ध संतों की सेवा से तीर्थंकर नाम गोत्र का बंध– सबसे बड़ा पाप है प्रताड़ना
सेवा और परोपकार की महिमा बताते हुए आचार्यश्री ने आगमों का प्रमाण दिया और दो टूक मार्गदर्शन किया।
१. कर्म निर्जरा का लक्ष्य : वृद्ध साधु-साध्वियों की सेवा से तीर्थंकर नाम गोत्र का बंध तक संभव है, किंतु सेवा हमेशा पुण्य की इच्छा के बिना, विशुद्ध कर्म निर्जरा के उद्देश्य से होनी चाहिए।
२. मर्यादा का पालन : दुनिया में किसी को प्रताड़ित करने और पीड़ा देने से बड़ा कोई पाप नहीं। इसलिए संघ व्यवस्था में आचार्य जहां भी नियोजित करें, तत्परता से सेवा में जुटें।
३. दुर्लभ समागम : 'योगक्षेम वर्ष' के महासंगम के कारण लाडनूं धरा पर जुटे पुराने साधु-साध्वियों की इस परिषद् का संपूर्ण आध्यात्मिक लाभ उठाएं।
भाद्रव शुक्ला नवमी को सजेगा दीक्षा का भव्य पांडाल– प्रवचन के दौरान मुमुक्षु रुचिका मालू ने पूर्ण वैराग्य भाव के साथ पूज्य चरणों में दीक्षा की भावभीनी अर्जी प्रस्तुत की। चतुर्विध धर्मसंघ की उपस्थिति में आचार्य प्रवर ने महती कृपा बरसाते हुए आगामी भाद्रव शुक्ला नवमी, तदनुसार २० सितंबर २०२६ को इसी जैन विश्वभारती परिसर में साध्वी दीक्षा प्रदान करने की पावन स्वीकृति प्रदान की।