स्वाध्याय
3 बातें ज्ञान की
तीनों प्रकार के वृक्षों में अंतर है। पहला वृक्ष है पत्तों वाला। जिस वृक्ष के केवल पत्ते होते हैं, वह अल्प उपकारी होता है। किसी राहगीर को छायादार वृक्ष के नीचे छाया मिल जाए तो आसानी से विश्राम हो सकता है। धूप में चलने वाले किसी प्यासे पथिक को पानी पीना हो तो उस वृक्ष के नीचे थोड़ी देर बैठकर, पसीना पौंछकर पानी पीया जा सकता है। इस तरह छायादार पत्तों वाला वृक्ष अल्प उपकारी होता है।
दूसरा वृक्ष है पुष्पों वाला। जिस वृक्ष के पुष्प हों, वह विशिष्ट उपकारी होता है। उसमें पत्ते तो हैं ही, साथ में पुष्प भी हैं। वह छाया के मिठास साथ सुगंध भी देनेवाला होता है। इसलिए पत्तों वाले वृक्ष की अपेक्षा पुष्पों वाला वृक्ष विशिष्ट उपकारी होता है।
तीसरा वृक्ष है फलों वाला। जिस वृक्ष के फल भी हैं, वह विशिष्टतर उपकारी होता है, क्योंकि उसमें पत्तों की छाया और पुष्पों की सुगंध के साथ फलों की मीठास भी है। कोई राहगीर ऐसे वृक्ष की शीतल छाया तले सुरभित वातावरण की अनुभूति के साथ-साथ मीठे फलों का आस्वादन भी कर सकता है। इसलिए पत्तों और पुष्पों वाले वृक्ष की अपेक्षा पत्तों, पुष्पों से युक्त फलों वाले वृक्ष की विशिष्टतर सुषमा होती है।
जिस प्रकार तीन प्रकार के वृक्ष बताए गए हैं, उसी प्रकार व्यक्ति भी तीन प्रकार के होते हैं। एक व्यावहारिक उदाहरण से बात को समझाने का प्रयास किया गया है। जैसे, एक सेठ के पास विशाल मकान है। उसमें अनेक कमरे हैं। एक दिन सेठ का परिचित व्यक्ति आया और उसने कहा-मुझे एक सप्ताह के लिए रहने का स्थान चाहिए। उदारवृत्ति सेठ ने सोचा कि मेरे पास तो बहुत कमरे हैं, इनमें से दो कमरे मैं इसे दे दूं तो यह सुखपूर्वक आराम से रह सकेगा। सेठ ने उसे अपने मकान में रहने की स्वीकृति प्रदान कर दी। सेठ ने रहने का स्थान तो उसे दे दिया, पर कभी उसके साथ बातचीत नहीं करता। उसके सुख-दुःख के बारे में कभी कुछ पूछता नहीं, अन्य किसी बात का ध्यान नहीं देता। कमरे तो दे दिए मगर उससे ज्यादा और कुछ नहीं दिया।
किसी दूसरे व्यक्ति के घर भी इसी प्रकार अतिथि आए। उसने अतिथि को दो कमरे तो दिए ही, साथ में बैठकर बातें भी कर लेता, उनसे बार-बार मिलता रहता, वात्सल्य और स्नेह के साथ सुखपृच्छा भी कर लेता।
किसी तीसरे व्यक्ति के घर भी इसी प्रकार अतिथि आए। उसने भी अतिथि को दो कमरे दिए, सम्मान और स्नेह के साथ-साथ उनको आग्रहपूर्वक भोजन भी अपने ही घर कराया।
पहले वाले सेठ ने केवल कमरे दिए। वह पत्तों वाले वृक्ष के समान अल्प उपकारी है। जो केवल छाया देता है, आश्रय देता है। दूसरे व्यक्ति ने कमरे भी दिए, स्नेह, सम्मान और वात्सल्य का व्यवहार भी किया। वह पुष्पों वाले वृक्ष के समान विशिष्ट उपकारी है जो आश्रय भी देता है और सुगंध भी। तीसरे व्यक्ति ने स्थान और सम्मान के साथ भोजन भी दिया। वह पत्तों, पुष्पों युक्त फलों वाले वृक्ष के समान विशिष्टतर उपकारी है। जो छायादार आश्रय और सुरभित वातावरण के साथ-साथ खाने के लिए मीठे फल भी देता है।
यह तो सांसारिक संदर्भ की बात है। अब इसी बात को धार्मिक संदर्भमें भी समझा जा सकता है। जैसे एक व्यक्ति साधुओं के प्रवास-स्थल में गया। एक साधु ने उस व्यक्ति को उपासना के लिए स्थान दे दिया, पर साधु ने उस व्यक्ति से कोई बातचीत नहीं की। आदमी आया, कुछ देर बैठा रहा और चला गया। वह साधु पत्तों वाले वृक्ष के समान है। किसी दूसरे साधु के पास भी कुछ व्यक्ति आए। उस साधु ने उन व्यक्तियों को उपासना के लिए स्थान तो दे ही दिया, साथ में थोड़ी बातचीत भी कर ली। स्नेह और वात्सल्य के साथ अच्छा व्यवहार किया। वह साधु पुष्पों वाले वृक्ष के समान है। किसी तीसरे साधु के पास भी कुछ लोग आए। उस साधु ने उन लोगों को स्थान दिया, थोड़ी व्यावहारिक बातें भी कीं और फिर तत्त्वज्ञान भी समझाया, शास्त्र की बातें बताईं, धार्मिक गीत सुनाए। वह साधु पत्तों, पुष्पों युक्त फलों के वृक्ष के समान है।
आदमी को यह सोचना चाहिए कि क्या वह पत्तों वाले वृक्ष के समान है या पुष्पों वाले वृक्ष के समान है या फलों वाले वृक्ष के समान है या तीनों ही नहीं है। व्यक्ति अल्प उपकारी क्यों रहे। उसे विशिष्ट उपकारी ही नहीं, विशिष्टतर उपकारी बनने का प्रयास करना चाहिए। दूसरों की भलाई करने का, परोपकार करने का समुचित प्रयास करना चाहिए।
आदमी को अनेक सक्षमताएं प्राप्त हो सकती हैं-शारीरिक सक्षमता, वचनात्मक सक्षमता, ज्ञानात्मक सक्षमता, आर्थिक सक्षमता, सत्ता की सक्षमता आदि। उसे यह सोचना चाहिए कि मैं अपनी सक्षमता का उपयोग कर रहा हूं या नहीं? केवल अपने लिए ही श्रम, शक्ति और समय का नियोजन कर रहा हूं या दूसरों की भलाई के लिए भी कुछ कर रहा हूं। आदमी केवल स्वार्थ के लिए ही न जीए, परार्थ के लिए भी जीने का प्रयास करे। परोपकार से आदमी के पुण्य का बंध भी होता है और पवित्र काम भी होता है। जो दूसरों का भला करेगा, उसका तो भला अपने आप ही हो जाता है। दूसरों का हित करनेवाला, दूसरों का कल्याण करनेवाला अपना भी हित और कल्याण कर लेता है। दूसरों का बुरा करनेवाला अपना भी बुरा कर लेता है। इसलिए किसी का अपकार नहीं, हो सके तो किसी के कल्याण का प्रयास करना चाहिए।