संबोधि

स्वाध्याय

– आचार्यश्री महाप्रज्ञ

संबोधि

रूपातीत ध्यान का प्रारंभ कल्पना की यात्रा से शुरू होता है, किन्तु समापन वास्तविकता में होता है। यदि केवल कल्पना की सीमा में साधक दौड़ता रहे तो वह निरालंबन, निर्विचार की मंजिल पर नहीं जा पाता। साधक का ध्येय है-आत्म-दर्शन। वह विचार-शून्यता में अभिव्यक्त होता है। अस्तित्व की झलक विचारों से तरंगित झील में प्रतिबिम्बित नहीं होती। इसलिए वास्तविक ध्यान का उद्देश्य रूपातीत की कल्पना से मुक्त होने पर दृष्टिगत होता है। ध्यान की गहराई में डूबे साधकों ने इसे ही ध्यान कहा है। आचार्य शुक्लचन्द्र ने कहा है-वही ध्यान है, वही विज्ञान है और वही ध्येय है जिसके द्वारा मन अविधा का अतिक्रमण कर अपने आत्म-स्वरूप में स्थित हो जाता है।'
यही ध्यान जब धारणा, ध्यान से मुक्त हो जाता है तब शुक्लध्यान में परिणत हो जाता है। आचार्य शुभचन्द्र ने कहा है-'वह शुक्लध्यान है जो क्रिया-मुक्त है, इन्द्रियों से परे है, ध्यान धारणा से रहित है और चित्तस्वरूप के सम्मुख रहता है।
आचार्य कुंदकुंद कहते हैं- 'पुरुष आकार शरीराकार ज्ञान-दर्शन से संपन्न आत्मा का जो योगी ध्यान करते हैं, वे द्वन्द्वातीत और पापमुक्त हो जाते हैं।
साधक जब अन्य ध्यान के प्रयोगों से सर्वथा प्रयत्नशून्य होकर एकत्व-अस्तित्व को प्राप्त कर लेता है। तब वास्तविक निश्चय ध्यान को उपलब्ध होता है। जिस स्थिति में चिंतन, वाणी और शारीरिक प्रयत्न सब शांत हो जाते हैं, आत्मा आत्मा में रत हो जाती है, वही परम ध्यान है।
आचार्य रामसेन की दृष्टि में यही समाधि है, समरसी भाव है और एकीकरण है। दोनों लोकों में यह फलप्रद है।
बुद्ध ने कहा है-यह पागल मन रुकता नहीं। यदि यह रुक जाय तो वही बोधि है, निर्वाण है। मन का मिट जाना स्वयं का होना है। जे. कृष्णमूर्ति कहते हैं-जहां विचार समाप्त होता है, वहां जीवन का प्रारंभ होता है। जीवन की वास्तविक अनुभूति मरकर ही की जा सकती है और वह ध्यान द्वारा संभव है। इसलिए वे कहते हैं-ध्यान विचार का अन्त है। ध्यान स्वयं एक ध्येय है। यह कोई वस्तु सिद्ध करने का साधन नहीं हैं। लेकिन ध्यान हो इससे पहले ध्यान करने वाले का अन्त होना चाहिए। बुद्ध ने भी अपने साधकों से यही कहा है-इससे पहले कि तुम परम सत्य को जानने जाओ ऐसे हो जाओ, जैसे कि तुम मर गए हो। कबीर इस प्रकार कहते हैं-जब तक मैं था खोज-खोज कर परेशान हो गया उसे नहीं पाया और अब मैं मिट गया तो मैंने देखा वह सामने खड़ा है। वह दूर नहीं था, 'मैं' था इसलिए दूर था। वूमिक नामक कवि ने कहा है-जैसे उगना होता है उसे बीज की तरह स्वयं को खोना पड़ता है और जो रेंगते हैं वे रेंगने की अवस्था से पंख निकलने की अवस्था तक पहुंच जाते हैं। ज़ेन साधक ह्वाकूजू इकाई से किसी ने पूछा-संसार में सर्वाधिक चमत्कार की घटना कौन-सी है? बड़ा गहरा उत्तर था ह्वाकूजू का कि 'मैं' अकेला जो यहां बैठा हूं मेरे साथ बस यही घटना है। महर्षि रमण ने कहा है-विचारों को रोक दो और फिर मुझे बताओं कि मन कहां है? किसी ने पूछा महर्षि रमण से कि ईश्वर के दर्शन कैसे हो सकते हैं? नहीं, नहीं ईश्वर के दर्शन नहीं हो सकते, लेकिन चाहो तो स्वयं ईश्वर हो सकते हो। ईश्वर के दर्शन से पूर्व स्वयं ईश्वर जैसी तैयारी करनी होती है। जिसने स्वयं के भीतर ईश्वर को पा लिया हो, उसके लिए ईश्वर कहां नहीं है और जिसे स्वयं के भीतर ईश्वर नहीं मिला, उसके लिए बाहर कहां संभव है।
ध्यान केवल शुद्ध समय है। समयसार में समय का अर्थ आत्मा किया है। समयसार अर्थात् आत्मसार। वर्तमान क्षण में ही आत्मा है। अतीत और भविष्य में आत्मा का अनुभव नहीं होता। जे० कृष्णमूर्ति कहते हैं-ध्यान समय से आगे की क्रिया है। ध्यान में कल्पना और विचार का स्थान नहीं है। ध्यान समय से मुक्ति है। देखने वाला (दृष्टा), अनुभव और विचार करने वाला समय है और जो समय है वह विचार है। शुद्ध ध्यान-निश्चयात्मक ध्यान में सिर्फ अस्तित्व है और वह काल का सूक्ष्मतम क्षण एक समय है।
एक साधु ने किसी से पूछा-ध्यान क्या है? संत ने कहा जो निकट है उसमें होना ध्यान है। जब मैं कहीं भी नहीं होता हूं तब स्वयं में होता हूं। ज़ेन साधक लिची अपने गुरु के पास जाकर पूछते हैं कि मैं अपने मन को कैसे बनाऊं ताकि सत्य को जान सकूं ? गुरु हंसे और बोले, तुम कैसा भी अपने मन को बनाओ सत्य को नहीं जान सकोगे। बड़ी अभीप्सा लेकर आया था वह। यह सुन कर मन को चोट पहुंची और पूछा कि सत्य को नहीं जान सकूंगा ? गुरु ने कहा-यह मैंने नहीं कहा कि तुम सत्य को नहीं जान सकोगे। लेकिन तुम मन से नहीं जान सकोगे। सत्य को जानना है तो मन को दूर छोड़ दो, मन से मुक्त हो जाओ।