संस्थाएं
धन्य हो गये आत्मानंद जी
आत्मानंद जी गृहस्थावास में भी साधु साध्वियों की आत्मीय भाव से सेवा करते थे। उन्हें धर्मध्यान के संस्कार अपनी माताजी से प्राप्त हुए थे। बचपन में पिताजी का स्वर्गवास हो गया था। माता ने कठिन परिश्रम करके बच्चों का पालन-पोषण किया था। माँ ने बच्चों को जो धार्मिक संस्कार दिये वे उनके लिए प्रेरणा दायी है। आत्मानंद जी को २०३६ लुधियाना चतुर्मास में गुरुदेव तुलसी ने स्वयं दीक्षा की प्रेरणा दी परन्तु बिना क्षयोपक्षम पके दीक्षा संभव नहीं है। आचार्य श्री महाश्रमण जी ने उनके जागरूक जीवन को देखकर ८० वर्ष की अवस्था में भी दीक्षा की अनुमति प्रदान करवाई। एक महिने पूर्व ही उन्होंने श्री चरणों में लिखित निवेदन किया कि मैं आपके श्री चरणों में अपनी नैय्या पार लगाना चाहता हूँ। भिन्न समाचारी व डॉक्टरों के चक्कर से बचना चाहता हूँ। मैंने (कमल मुनि) देखा कि वे अपने उपकरणों की पलेवणा ही नहीं प्रक्षालन का काम भी स्वयं करते , मैने बार-बार आग्रह पूर्वक निवेदन किया कि आप सेवाग्राही है, परंतु वे कहते मेरे हाथ पैर बेकार हो जाएंगे, मैंने मेरे ५५ वर्षीय साधु जीवन में प्रथम संत देखा जो ९३ वें साल की उम्र में भी स्वावलंबी बनकर रहे, उन्होंने इस उम्र में आत्मकथा लिखकर कीर्ति मुनि को भेंट की। अंतिम दिन भी सदा की तरह प्रथम प्रहर में मेरे साथ प्रातराश किया, दोपहर को भी कुछ लिया मैं दोपहर को १२.२५ पर व्याख्यान देने गया तब वे पंचमी पधार रहे थे मैंने सदा की तरह अपना व्याख्यान प्रारंभ किया थोड़ी ही देर में मुनि जिज्ञासु कुमार जी आये और कहने लगे एक बार अन्दर पधारें मैंने सोचा नमि मुनि के तपस्या चल रही है शायद कोई चक्कर आ गया होगा ? परंतु मैं अन्दर आया और देखा संत लोग एकत्रित हो गये बहुश्रुत परिषद के सदस्य मुनि दिनेश कुमार जी भी पहुंच गये थे, मुनि आत्मानंद जी ने कहा महाराज मेरा समय आगया है अब आप त्याग प्रत्याख्यान कराओ मैं सुनकर चकित रह गया। मैं व्याख्यान समाप्त करके आधा घंटे में आया और कहने लगे मेरे हाथ पैर ठंडे हो रहे हैं आप त्याग प्रत्याख्यान कराओ,ड्रिप समाप्त होते ही गुरुदेव को निवेदन किया। गोष्ठी चल रही थी मुख्य मुनि प्रवर, साध्वी प्रमुखा जी, साध्वीवर्या जी के साथ-अन्य साधु साध्वी थे मैंने जैसे ही आत्मानंद जी की स्थिति निवेदन की गुरुदेव ने तत्काल गोष्ठी सम्पन्न की और आत्मानंद जी के दर्शन देने भयंकर धूप में भी पधारे आत्मानंद जी ने वंदना की गुरुदेव से, साधु,साध्वियों से खमत खामना किये और निवेदन किया कि मेरा समय आ गया है आप मुझे संथारे का प्रत्याख्यान करवादें। तब गुरुदेव ने फरमाया संथारा सुखे समाधे नहीं होता है तब मुख्य मुनि प्रवर को आत्मानंद जी ने कहा सुखे समाधे नहीं अब तो जाव जीव का प्रत्याख्यान करवादें परंतु गुरुदेव ने एक साथ संथारा नहीं करवा कर तीन घंटे का त्याग करवाया। गुरुदेव काफी देर विराजे सेवा करवाई मैंने निवेदन किया कि प्रातराश किया प्रवचन में गये ११.३० बजे मैं विश्राम में गया तब तक ठीक थे पता नहीं एक साथ क्या हो गया डाक्टर आये उन्होंने उपचार की सलाह दी गुरुदेव ने स्वयं पुछवाया? परंतु उन्होंने मनाही करदी। उनकी अस्वस्थता के समाचार सुन संत गण एकत्रित हो गये और लगभग अंतिम श्वास तक संतों ने जाप आराधना आदि सुनाकर उन्हें अच्छा आध्यात्मिक सहयोग दिया यह सब गुरु कृपा से ही संभव हो सका। मुझे उनकी अंतिम समय सेवा का अवसर मिला।