'तुलसी' स्वरूपा पवित्र आत्मा 'गंगा' में विलीन हो गई : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

लाडनूं। 03 जुलाई, 2026

'तुलसी' स्वरूपा पवित्र आत्मा 'गंगा' में विलीन हो गई : आचार्यश्री महाश्रमण

जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता,शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमण जी की पावन सन्निधि में लाडनूं की जैन विश्व भारती की सुधर्मा सभा में तेरापंथ धर्मसंघ के नवम् अधिशास्ता, युगप्रधान गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी का ३०वां महाप्रयाण दिवस पूरी श्रद्धा और गरिमा के साथ समायोजित हुआ।
गुरु और वृद्धों की सेवा ही परमसुख का मार्ग : प्रातः कालीन मुख्य प्रवचन कार्यक्रम में वर्तमान अधिशास्ता आचार्य श्री महाश्रमण जी ने चतुर्विध धर्मसंघ को 'उत्तरज्झयणाणि आगम' के माध्यम से पावन प्रतिबोध प्रदान किया। आचार्यप्रवर ने फरमाया कि:
आगम में जो कल्याणकारी मार्ग बताया गया है, उसके अनुसार गुरु की सेवा करना परमसुख की दिशा में बढ़ाने वाला तत्व है।
इसके साथ ही, वृद्धों की सेवा करना भी जीवन को वास्तविक सुख और उन्नति की ओर ले जाता है।
जन्म और मरण सामान्य घटना, महत्वपूर्ण यह है कि जीवन कैसे जिया : गुरुदेव ने गणाधिपति तुलसी के गौरवशाली जीवन वृत्त पर प्रकाश डालते हुए फरमाया कि आज गुरु से जुड़ा हुआ विशेष दिन है। आदमी जन्म लेता है, जीवन जीता है और एक दिन अवसान को प्राप्त हो जाता है। जन्म लेना और मृत्यु को प्राप्त होना एक सामान्य घटना है, क्योंकि यह समान रूप से सबके लिए लागू होता है; परन्तु आदमी जीवन को किस तरह जीता है, यह सबसे महत्वपूर्ण है।
१. दीक्षा और दायित्व : आचार्य श्री तुलसी का जन्म वि.सं. १९७१, कार्तिक शुक्ला द्वितीया को लाडनूं की इस पावन धरा पर हुआ था। लाडनूं में ही उन्होंने महज १२वें वर्ष की अल्पायु में मुनित्व को अंगीकार किया।
२. ऊंचाइयों का आधार : आगे चलकर वे तेरापंथ धर्मसंघ के प्रमुख और अधिशास्ता बने। उनके जीवन में पुण्याई का भी अच्छा योग था, साथ ही उनका कड़ा पुरुषार्थ और आंतरिक पवित्रता भी उन्हें ऊँचाइयों तक ले जाने में सहयोगी रहे।
३. एकमात्र आचार्य : गुरुदेव तुलसी का मुनि जीवन अत्यंत गौरवपूर्ण रहा और परम पूज्य कालूगणी ने लगभग २२ वर्ष की अवस्था में ही उन्हें युवाचार्य पद की जिम्मेदारी सौंप दी। वे सबसे कम उम्र में युवाचार्य व आचार्य बनने वाले और सबसे ज्यादा वर्षों तक आचार्य पद पर रहने वाले हमारे धर्मसंघ के एकमात्र आचार्य हुए।
ऐतिहासिक चातुर्मास और देशव्यापी अणुव्रत आंदोलन : शांतिदूत ने आगे फरमाया कि नेतृत्व संभालने के बाद धर्मसंघ ने भी इस युवा आचार्य को बहुत बहुमान दिया, जहाँ मुनि श्री मगनलाल जी स्वामी जैसे वरिष्ठ संतों का उन्हें पूर्ण सहकार मिला।
१. राजधानी में चातुर्मास : आचार्य श्री तुलसी ने वि.सं. २००६ का चातुर्मास जयपुर में और तत्पश्चात् देश की राजधानी दिल्ली में ऐतिहासिक चातुर्मास किया। वे पहले ऐसे आचार्य बने जिन्होंने दिल्ली में चातुर्मास किया, जिससे देश के अनेक राजनेता और धर्मनेता उनके संपर्क में आए।
२. हस्तियों का आगमन : इसके बाद उनके द्वारा प्रारंभ किया गया 'अणुव्रत आन्दोलन' एक ऐसा देशव्यापी कार्यक्रम बना, जिससे लाडनूं जैसे शहर में देश की अनेक बड़ी हस्तियों का आगमन हुआ। वे धर्मसंघ के प्रथम आचार्य थे जिन्होंने कलकत्ता और फिर दक्षिण भारत की लंबी यात्राएं कीं।
विरोधों को 'विनोद' समझने का क्रांतिकारी घोष : आचार्यप्रवर ने विशेष रूप से रेखांकित करते हुए फरमाया कि यात्राओं के दौरान वैचारिक विरोध भी उनके साथ-साथ चला और संघ के भीतर से भी कुछ संघर्ष उत्पन्न हुए, परन्तु उन संघर्षों से तप कर आचार्य श्री तुलसी का व्यक्तित्व और भी निखर कर सामने आया।
१. कालजयी घोष : उनका यह प्रसिद्ध घोष रहा कि—‘जो हमारा करे विरोध, उसे हम समझें विनोद।’ उन्होंने तमाम विरोधों को सहजता से झेलते हुए समाज को प्रेक्षाध्यान और जीवन विज्ञान जैसे क्रांतिकारी आयाम दिए।
२. प्रशासनिक कौशल : वर्ष २०१२ में उन्होंने जो आगम संपादन के कार्य की ज्योति जलाई थी, वह आज भी निरंतर प्रज्ज्वलित हो रही है। आचार्य तुलसी के व्यक्तित्व का एक सुदृढ़ अंग उनका प्रशासनिक कौशल था। समण श्रेणी, पारमार्थिक शिक्षण संस्था और जैन विश्व भारती जैसे बड़े संस्थान उनके आचार्यकाल में ही प्रारंभ हुए।
३. नवीन उन्मेष : गंगाशहर में उनका महाप्रयाण हुआ था। उनके कार्यकाल में धर्मसंघ में अनेक नवीन उन्मेष हुए, जिससे विशेषकर साध्वी समुदाय और श्राविका समुदाय को आगे बढ़ने का पूरा अवसर प्राप्त हुआ। आचार्यश्री ने गणाधिपति के प्रति अपनी अत्यंत विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित की।
गणाधिपति आचार्य श्री तुलसी प्रति भावांजलि :
१. गीत संगान : साध्वी स्तुतिप्रभा जी व साध्वीवृंद तथा संत वृंद ने सामूहिक गीतों का संगान किया।
२. भावाभिव्यक्ति : पारमार्थिक शिक्षण संस्था में प्रवेश करने वाली मुमुक्षु विधि कुण्डलिया और आचार्यश्री तुलसी के सांसारिकपक्षीय परिवार की ओर से राजेन्द्र खटेड़ ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी।