गुरुवाणी/ केन्द्र
सूर्य की तरह नियमित और व्यवस्थित रहना ही आत्मा का असली तेज़ है : आचार्यश्री महाश्रमण
जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी ने सुधर्मा सभा में ‘सूर्य की तरह दीप्तिमान रहें’ पर चतुर्विध धर्मसंघ को पावन प्रतिबोध प्रदान किया।
सूर्य के ३ अलौकिक गुण: आचार्यप्रवर ने सुधर्मा सभा को संबोधित करते हुए फरमाया कि इस सृष्टि में सूर्य, चन्द्रमा, पृथ्वी और प्राणी हैं और सिद्ध भगवान भी हैं। हमें सूर्य के जीवन से ३ बड़े गुणों की सीख लेनी चाहिए।
१. नियमितता और व्यवस्थितता : सूर्य एक तेजस्वी तत्त्व है जो अद्भुत नियमितता से अपना कार्य करता है। वह मर्यादित रूप में उदय होता है और मर्यादित रूप में ही अस्ताचल को चला जाता है। उसकी यह व्यवस्था हर मनुष्य के लिए प्रेरणादायी है।
२. स्वयं प्रकाशी और प्रकाशक : सूर्य का दूसरा गुण है कि वह स्वयं प्रकाशी है और पूरी सृष्टि को प्रकाश देने वाला है।
३. तापवत्ता : सूर्य का तीसरा गुण है कि यह ताप देने वाला है। सर्दी के मौसम में जब सूर्य उदित होता है, तो उसके ताप से संसार को सर्दी से थोड़ी राहत मिलती है।
तीर्थंकरों की महिमा और साधु जीवन का सूर्यत्व:
१. चंद्रमा से भी निर्मल हैं सिद्ध भगवान : संकीर्तन का हवाला देते हुए आचार्यश्री ने फरमाया कि जिस प्रकार आदित्य (सूर्य) आकाश में प्रकाशित होता है, वैसे ही केवल ज्ञानी तीर्थंकर—जो अभी सिद्ध अवस्था में हैं—वे चंद्रमाओं से भी अधिक निर्मल और सूर्यों से भी अधिक प्रकाश करने वाले हैं।
२. सद्ज्ञान से दीप्तिमान हों महर्षि : शास्त्र में कहा गया है कि जैसे सूर्य आकाश में दीप्तिमान होता है, वैसे ही साधु या महर्षि को भी सूर्य की तरह दीप्तिमान होना चाहिए। साधु सद्ज्ञान से संपन्न होता है और जिस साधु के पास ज्ञान का भंडार हो, वह साधु स्वतः प्रकाशमान हो सकता है।
३. मति और श्रुत ज्ञान की महत्ता : वर्तमान में केवल ज्ञानी, चतुर्दशपूर्वी अथवा चार ज्ञान संपन्न साधु तो नहीं हैं। अवधि ज्ञानी भी कोई हो तो हो, पर मति और श्रुत ज्ञान संपन्न हैं। गृहस्थ में और पशुओं में भी ये दो ज्ञान हो सकते हैं, लेकिन साधु का ज्ञान विशेष होता है।
व्यक्तित्व निर्माण और अग्रणी साधु-साध्वियों को विशेष प्रेरणा:
१. रुचि के अनुरूप मिले ज्ञान : कोई साधु अथवा साध्वी सद्ज्ञान
से संपन्न हों और वे दूसरों को भी सद्ज्ञान दें तो कितना अच्छा हो सकता है। वे नए साधु-साध्वियों के व्यक्तित्व का निर्माण करने में अच्छा योगदान दे सकते हैं।
२. तीन वर्ष में एक वैरागी तैयार करने का आह्वान : आचार्यश्री ने साधु-साध्वियों को विशेष प्रेरणा प्रदान करते हुए कहा कि क्षेत्रों के अथवा सिंघाड़े के अग्रणी साधु-साध्वियां तीन वर्ष में कम से कम एक वैरागी-वैरागण तैयार कर प्रस्तुत करने का प्रयास करें।