डिग्रियां तो बस कागज का टुकड़ा हैं, असली गहना ऊंचा चरित्र : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

लाडनूं। 06 जुलाई, 2026

डिग्रियां तो बस कागज का टुकड़ा हैं, असली गहना ऊंचा चरित्र : आचार्यश्री महाश्रमण

जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्म संघ के एकादशमाधिशास्ता, शांतिदूत युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी ने सुधर्मा सभा में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को ‘विद्या और आचार के पारगामी: आचार्य कुमार श्रमण केशी’ विषय पर अमृत देशना प्रदान की। उत्तरज्झयणाणि आगम के गूढ़ रहस्यों को उद्घाटित करते हुए आचार्यश्री ने फरमाया कि अध्यात्म की साधना की दृष्टि से ज्ञान और चरित्र का अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान है। पूज्य प्रवर ने जीवन को पवित्र बनाने का पाथेय देते हुए फरमाया कि विद्या में पारंगत होना अपने आप में बड़ी बात है, पर चारित्रवान होना बहुत बड़ी बात है। चारित्रवान भी हो और साथ में ज्ञानवान और तत्त्ववेत्ता हो तो वह और भी अच्छी बात हो जाती है। जिसका चारित्र अच्छा होता है उसकी मुक्ति सुनिश्चित है।
वर्तमान अवसर्पिणी काल और तीर्थंकर व्यवस्था : आचार्यश्री ने काल चक्र की व्यवस्था और तीर्थंकरों के इतिहास को स्पष्ट करते हुए निम्नलिखित मुख्य बिंदु समझाए।
१. तीर्थंकरों की व्यवस्था : जम्बू द्वीप के इस भरत क्षेत्र में इस अवसर्पिणी काल में २४ तीर्थंकर हो चुके हैं और २४ ही तीर्थंकरों की व्यवस्था है।
२. वर्तमान में अभाव : अब हजारों वर्षों तक इस अवसर्पिणी काल में कोई नए तीर्थंकर होने वाले नहीं हैं। इसलिए वर्तमान में तीर्थंकरों का अभाव है।
३. प्रथम व अंतिम तीर्थंकर : इस अवसर्पिणी काल के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभ और अंतिम तीर्थंकर भगवान महावीर हुए। भगवान महावीर से अनंतर पूर्ववर्ती अर्थात् तेईसवें तीर्थंकर भगवान पार्श्व हुए।
भगवान पार्श्वनाथ की गरिमा और शिष्य परंपरा : तेईसवें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ की अद्भुत महिमा और उनकी परंपरा का उल्लेख करते हुए पूज्यप्रवर ने बताया।
१. लोक पूजित और पुरूषादानीय : आगम में भगवान पार्श्व के लिए कहा गया है कि वे अर्हत् थे, वीतराग थे और लोक पूजित थे। ‘लोक पूजित’ विशेषण भगवान पार्श्व की मानो अतिरिक्त गरिमा को प्रकट करने वाला हो सकता है। उनके लिए 'पुरूषादानीय' शब्द भी आता है, जो मानो उनकी लोकप्रियता का द्योतक है।
२. स्त्रोत और मंदिर : सबसे अधिक स्त्रोत और मंत्र भगवान पार्श्व के प्राप्त हैं और सबसे अधिक मंदिर भी संभवतः भगवान पार्श्वनाथ के ही हैं। वे धर्म तीर्थंकर थे।
३. परंपरा का अस्तित्व : भगवान पार्श्व की अपनी शिष्य परंपरा थी और भगवान महावीर के समय भी भगवान पार्श्व की परंपरा के शिष्य विद्यमान थे, ऐसा आगमों में उल्लेख मिलता है। भगवान पार्श्व लोक प्रदीप और ज्ञान का प्रकाश करने वाले थे।
आचार्य कुमार श्रमण केशी: विद्या और आचार के पारगामी: भगवान पार्श्व की परंपरा के महायशस्वी शिष्य का उदाहरण देते हुए आचार्यश्री ने चारित्र की प्रधानता पर प्रकाश डाला।
१. अविवाहित अवस्था में दीक्षा : भगवान पार्श्व की परंपरा में ही उनके एक महायशस्वी शिष्य थे, उनका नाम था केशी कुमार श्रमण। उन्होंने अविवाहित अवस्था में ही दीक्षा ली और साधुत्व को स्वीकार किया। वे इस परंपरा में चौथे पट्टधर आचार्य थे।
२. ज्ञान और चरित्र का मेल : शास्त्र में उनकी एक बड़ी विशेषता बताई गई है कि वे विद्या में भी और चरण यानी आचार में भी पारगामी थे। पारगामी अर्थात् वे बहुत गहरे विशिष्ट ज्ञानी थे।
३. चारित्र से मुक्ति : विद्यावान होना बड़ी बात है, पर चरित्रहीन विद्या अधूरी है। जिसका चारित्र अच्छा होता है उसकी मुक्ति सुनिश्चित है।
४. दो ज्ञानियों का मिलन : इस अध्ययन में दो ज्ञानी पुरुषों के मिलने और उनकी ज्ञान चर्चा की बात आती है। दो ज्ञानी संतों का मिलना हो जाए और उनकी चर्चा लोगों को सुनने को मिले तो समाज को अत्यधिक लाभ और ज्ञान मिल सकता है।
पुस्तकों के अध्ययन की प्रेरणा: आचार्य श्री ने ‘तेरापंथ दर्शन’ पुस्तक और ‘भिक्षु विचार दर्शन’ पुस्तक जो आचार्य श्री महाप्रज्ञ जी द्वारा लिखी गई है, इस योगक्षेम वर्ष में उनका अच्छा अध्ययन कर सभी को अपना ज्ञानात्मक विकास करने की पावन प्रेरणा दी।