'ना कुछ तेरा, ना कुछ मेरा, यह दुनिया रैन बसेरा' : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

लाडनूं। 01 जुलाई, 2026

'ना कुछ तेरा, ना कुछ मेरा, यह दुनिया रैन बसेरा' : आचार्यश्री महाश्रमण

जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, अहिंसा यात्रा प्रणेता युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण जी ने सुधर्मा सभा में ‘अमन और अकिंचन रहे’ विषय पर पावन प्रतिबोध प्रदान किया।
आचार्यश्री ने फरमाया कि साधना शील व्यक्ति के चारित्र की गरिमा आगम के स्वाध्याय से ही पुष्ट होती है। शास्त्र का निर्देश है कि साधु पूरी तरह ममता रहित (अमन) और परिग्रह रहित (अकिंचन) रहे। साधु को अपने शरीर से भी मोह नहीं होना चाहिए, क्योंकि ज्ञान, दर्शन और चारित्र के अलावा इस संसार में आत्मा का अपना कुछ भी नहीं है।
आचार्यप्रवर ने गृहस्थ और साधु के चिंतन के अंतर को स्पष्ट करते हुए तीन धाराएं बताईं–
१. गृहस्थ की सोच : अति परिग्रह की भावना के कारण संसारी जीव की भाषा होती है कि—'मेरा है सो मेरा, तेरा सो भी मेरा'।
२. साधु की उदारता : साधना के मार्ग पर बढ़े हुए साधक का चिंतन होता है कि—'तेरा सो तो तेरा, मेरा सो भी तेरा'।
३. सर्वोच्च परमार्थ सत्य : उच्च कोटि के महर्षि की भाषा होती है—'ना कुछ तेरा, ना कुछ मेरा, यह दुनिया रैन बसेरा', क्योंकि जो कुछ है सब यहीं छोड़कर जाना है।
अकिंचन ही होता है तीनों लोकों का स्वामी : गुरुदेव ने अकिंचन (जिसके पास कुछ न हो) और सकिंचन (जो संग्रह करता है) के भेद को समझाते हुए फरमाया कि सकिंचन व्यक्ति केवल उतने ही हिस्से का मालिक होता है जितना धन-वैभव उसके पास है। इसके विपरीत, जिसने सब कुछ छोड़ दिया और पूर्ण अपरिग्रही बन गया, वह एक दृष्टि से पूरी दुनिया का मालिक यानी तीन लोक का स्वामी हो जाता है। परिग्रह साधु को हमेशा पतन की ओर ले जाता है, जबकि अपरिग्रह की साधना एक कंचन (हीरा) है।
आगम के आलोक में गुरुदेव ने सच्चे साधक के अनिवार्य लक्षण बताए–
१. परमार्थ पदों में रमण : साधु को हमेशा सम्यक् ज्ञान, सम्यक् दर्शन और सम्यक् चारित्र के परमार्थ पदों में ही लीन रहना चाहिए।
२.छिन्न शोक (शोक से मुक्ति): साधक को कर्मों के आगमन (आस्रवों) को रोकने वाला होना चाहिए। संसार पक्ष के माता-पिता या सगे-संबंधियों की मृत्यु पर भी साधु के मन में शोक नहीं होना चाहिए।
३.संयम के प्रति अविचल निष्ठा: असंयम के प्रति आकर्षण को पूरी तरह नष्ट कर, रुपये-पैसों के मोह से दूर रहकर साधु को केवल वही कार्य करना चाहिए जिससे उसकी आत्मा का परम हित हो।