स्वाध्याय
धर्म है उत्कृष्ट मंगल
उपकार भी दो प्रकार का हो सकता है— सांसारिक (लौकिक) उपकार और लोकोत्तर उपकार।
कोई माता-पिता अपनी संतान को पढ़ाए-लिखाए, उसकी शादी कराए तो यह सांसारिक उपकार हो जाता है, लौकिक उपकार हो जाता है। यदि कोई माता-पिता इस बात पर ध्यान दें कि उनकी संतान में अच्छे संस्कार आएं, वह नीतिवान बने, चरित्रवान बने, अच्छा इंसान बने, साधु-संतों के संपर्क से अपनी संतान को सुसंस्कारी बनाए तो यह लोकोत्तर उपकार हो जाता है।
दूसरों का कल्याण हो सके वैसी क्षमता का भी विकास होना चाहिए। आदमी के पास कुछ होगा तभी वह किसी को कुछ दे सकेगा। जैसे किसी व्यक्ति के पास मकान है ही नहीं तो वह दूसरों को रहने के लिए कमरे कैसे देगा? किसी व्यक्ति के पास पैसा है ही नहीं तो वह दूसरों को दान कैसे देगा? धर्म के संदर्भ में भी यदि किसी साधु के पास तत्त्वज्ञान या आगमिक ज्ञान है ही नहीं, तो वह दूसरों को ज्ञान कैसे बांट सकेगा? इसलिए व्यक्ति को स्वयं को शक्ति संपन्न, सामग्री संपन्न बनने का प्रयास करना चाहिए और फिर उस शक्ति को, उस सामग्री को जितना हो सके दूसरों को वितरित करने का प्रयास करना चाहिए। किसी के पास कुछ है और देने का अवसर आने पर भी यदि वह नहीं देता है, तो वह आदमी दरिद्र कहलाता है। आचार्य भिक्षु के साहित्य में कहा गया है—
घर में धन पिण दलद्री, जिके न देवे दान।
भार भूत धन तेहनों, कोरो करे गुमांंन।।
किसी व्यक्ति के पास धन होने पर भी जब कोई मांगने आता है तब वह उसे न दे, तो वह व्यक्ति दरिद्र ही होता है। उसका धन भारभूत होता है। भले ही वह अपने धन पर अहंकार कर ले मगर उसका धन किसी के उपयोग में नहीं आता है।
यह मानव जीवन बीत रहा है। पता नहीं कब हमारे इस शरीर की शक्ति और सक्षमता भी चली जाए। इसलिए जब तक शरीर सक्षम है, तब तक आदमी को स्वकल्याण और परकल्याण करने में इसका उपयोग करने का प्रयास करना चाहिए।
तीन उत्तम पुरुष
'ठाणं' सूत्र में बताया गया है— उत्तमपुरिसा तिविहा पण्णत्ता, तं जहा-धम्मपुरिसा, भोगपुरिसा, कम्मपुरिसा। धम्मपुरिसा अरहंता, भोगपुरिसा चक्कवट्टी, कम्मपुरिसा वासुदेवा। (3/33)
उत्तम पुरुष तीन प्रकार के होते हैं—
धर्मपुरुष — अर्हत्भो
गपुरुष — चक्रवर्ती
कर्मपुरुष — वासुदेव
धर्म के क्षेत्र में जो उत्तम है, वह धर्मपुरुष है। भोग के क्षेत्र में जो उत्तम है, वह भोगपुरुष है और कर्म के क्षेत्र में जो उत्तम है, वह कर्मपुरुष है। पुरुष तीन प्रकार के होते हैं—उत्तम पुरुष, मध्यम पुरुष और जघन्य पुरुष। अपने क्षेत्र में जो निम्न स्तर के हैं, वे जघन्य पुरुष होते हैं। जो बीच के स्तर के हैं, वे मध्यम पुरुष होते हैं और अपने क्षेत्र में जो बहुत उच्चकोटि के हैं, सर्वोच्च हैं, वे उत्तम पुरुष होते हैं।
उत्तम पुरुष का पहला प्रकार है— धर्मपुरुष। धर्म के क्षेत्र में उत्तम होते हैं अर्हत्। जैसे न्याय के क्षेत्र में सर्वोच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश एक तरह से उत्तम व्यक्ति है, वैसे ही आध्यात्मिक जगत् में तीर्थंकर से उत्तम कोई अन्य व्यक्ति नहीं होता। प्रश्न किया गया कि तीर्थंकर उत्तम पुरुष क्यों होते हैं? अर्हत् चार घनघाती कर्मों का नाश करते हैं। यद्यपि अर्हतों की तरह चार घनघाती कर्मों को नष्ट करने वाले अनेक केवली हो सकते हैं, किन्तु तीर्थंकर इसलिए उत्तम माने गए हैं, क्योंकि वे केवलज्ञान प्राप्ति के साथ-साथ धर्म के क्षेत्र में 'तीर्थ' की स्थापना भी करते हैं। जबकि सामान्य केवली तीर्थ की स्थापना नहीं करते।
एक समय और एक क्षेत्र में केवली तो अनेक हो सकते हैं, परन्तु तीर्थंकर उनमें से एक ही होते हैं। जैसे, किसी धर्मसंघ में पांच महाव्रतों का पालन साधुओं के लिए भी अनिवार्य है और आचार्य के लिए भी। परन्तु निर्णायकता की दृष्टि से, अनुशासन की दृष्टि से आचार्य ही श्रेष्ठ होते हैं, दायित्ववान होते हैं।
संस्कृत साहित्य में कहा गया है— जातौ जातौ यदुत्कृष्टं रत्नमभिधीयते। अर्थात् अपनी-अपनी जाति में जो श्रेष्ठ होता है, उत्कृष्ट होता है, वह रत्न कहलाता है। ज्ञान के क्षेत्र में भी तीर्थंकर सर्वोच्च होते हैं, उनसे बड़ा कोई ज्ञानी नहीं होता। चारित्र के क्षेत्र में भी तीर्थंकर सर्वोच्च होते हैं, उनसे बड़ा कोई चारित्रवान नहीं हो सकता। ज्ञान और चारित्र के साथ-साथ धर्म जगत् का नेतृत्व करने वाले तीर्थंकर होते हैं। वे अधिकृत प्रवचनकार होते हैं। इसलिए उनको धर्मपुरुष कहा गया है।