संबोधि

स्वाध्याय

– आचार्यश्री महाप्रज्ञ

संबोधि

महान् योगी साधक श्रीमद् राजचन्द्र ने आत्म-दर्शन की प्रक्रिया इन शब्दों में प्रस्तुत की है— 'यह आत्मा वर्तमान शरीरप्रमाण है। शरीर में स्थिति होते हुए भी शरीर से पृथक् है, पुरुषाकार है, चिन्मय है, ऐसा समझ कर देखें तो उसका दर्शन होता है। इन्द्रियों का निरोध कर, श्वास को शांत कर, मन को संयमित कर तथा आंखें बन्द कर सुज्ञान नेत्र द्वारा देखने से यह आत्मा प्रत्यक्ष होती है।'
उपरोक्त तथ्यों से यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि निर्विचार, निरालंबन ध्यान ही एकमात्र ध्यान है। सालंबन निरालंबन से संयुक्त होने के कारण वह भी अमान्य नहीं है, किन्तु ध्येय शुद्ध आत्मा है। साधक की दृष्टि से ध्येय विस्मृत नहीं होना चाहिए। यह सर्वदा आंखों के सामने तैरता रहे। सालंबन से निरालंबन की यात्रा पर उसे निकलना है। निरालंबन या निश्चयात्मक ध्यान पर पहुंचने के लिए कुछ प्रयोग हैं, जिनके माध्यम से सहजतया वह यात्रा सम्पन्न की जा सकती है।
आचार्य शुभचन्द्र ने अपने ध्यानशास्त्र 'ज्ञानार्णव' में एकमात्र मनोजय—मन-शुद्धि पर बल दिया है। वे कहते हैं— 'चित्त शुद्धि न कर जो केवल मुक्त होना चाहता है, वह मृगतृष्णा की नदी में पानी की इच्छा करता है।' जो साधक भेद-विज्ञान की दहलीज पर पैर रखते हैं, वे सबसे पहले मन की चंचलता का अवरोध करते हैं। मन की शुद्धि से ही निःसन्देह मनुष्यों की शुद्धि होती है। उसके अभाव में सिर्फ शरीर को पीड़ित करना व्यर्थ है। मन की शुद्धि केवल ध्यान को ही शुद्ध नहीं करती, अपितु कर्मसमूह को भी विच्छिन्न करती है। चित्तशुद्धि के अभाव में केवल ध्यान की चर्चा करने वाला मूढ़ है। मनःशुद्धि के द्वारा सब साध्य हैं। जिसका चित्त स्थिर हो गया, कलुषता से मुक्त हो गया और ज्ञान से सुवासित हो गया, उस ध्यान का साध्य सिद्ध हो गया। उसके लिए काया को कष्ट देना व्यर्थ है।
इस समग्र चर्चा का प्रतिपाद्य है—मनोजय और मनःशुद्धि। दोनों निस्संदेह कठिनतम हैं, किन्तु असाध्य नहीं हैं। साधक में साध्य प्राप्ति की अभीप्सा हो, गहन निष्ठा हो और सतत श्रमशीलता हो तो कुछ भी कठिन नहीं है। मनोजय और मनःशुद्धि दोनों के लिए दो अलग साधन पद्धतियां नहीं, बल्कि एक ही है। वह है—जागरूकता और विचार-दर्शन। जागरूकता से अशुद्धि का द्वार निरुद्ध होगा और विचार-दर्शन से क्रमशः निर्विचारता का पथ प्रशस्त होगा। यह पद्धति केवल कुछेक के लिए नहीं, अपितु सर्वत्र प्रयोज्य है। रोग सहस्रों हों, पर सबकी औषधि एक है। अध्यात्म की दृष्टि से देखें तो मुख्य रोग एक प्रमत्तता (असावधानी) ही है। उसे दूर करने पर सब बीमारियां दूर हो जाती हैं। इसलिए विवेक, अप्रमत्तता और जागरूकता पर सबने विशेष बल दिया है। अपनी समस्त वृत्तियों के प्रति सर्वदा सचेत रहना, तटस्थ भाव से देखना, यही सहज-सरल मार्ग है जो चैतन्य के साथ संयुक्त करता है।
'मनोनुशासनम्' की व्याख्या में आचार्यश्री महाप्रज्ञ ने कुछ प्रयोग निरालंबन निर्विचार ध्यान के लिए प्रस्तुत किये हैं, जो इस प्रकार हैं–
निरालंबन ध्यान की कुछ पद्धतियां हैं। उन्हें जानने पर उसका अभ्यास सहज हो जाता है।
पहला अंग है— प्रयत्न की शिथिलता: सालंबन ध्यान में जैसे शरीर, वाणी और श्वास का प्रयत्न शिथिल कर दिया जाता है, उसी प्रकार निरालंबन ध्यान में मन का प्रयत्न भी शिथिल किया जाता है। निरालंबन ध्यान वस्तुतः अप्रयत्न की स्थिति है।
दूसरा अंग– निरभ्र आकाश की ओर टकटकी लगाकर देखते जाइए। थोड़े समय में चित्त विचारशून्य हो जायेगा।
तीसरा अंग– केवल कुम्भक का अभ्यास कीजिए। मन विचार-शून्य हो जायेगा।
चौथा अंग– मानसिक विचारों को समेट कर हृदय चक्र की ओर ले जाइए। फिर गहराई तक उतरने का अनुभव कीजिए। ऐसा करते ही चित्त विचार-शून्य हो जाएगा।
पांचवां अंग– आत्मा या चैतन्य केन्द्र की धारणा को दृढ़ कर उसके सान्निध्य का अनुभव कीजिये। वह सहज, शांत और निर्विचार हो जाएगा।
इस प्रकार अनेक पद्धतियां हैं, जिनके द्वारा निर्विचार ध्यान को सुलभ बनाया जा सकता है, किंतु उन सब में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण पद्धति है—अप्रयत्न, प्रयत्न का विसर्जन, प्रवृत्ति का विसर्जन।