श्रमण महावीर

स्वाध्याय

– आचार्यश्री महाप्रज्ञ

श्रमण महावीर

'इस प्रकार जीव और पुद्गल की गति में सहायता की अपेक्षा होती है। उसकी पूर्ति जिससे होती है, वह तत्त्व धर्मास्तिकाय है।'
'भंते! अधर्मास्तिकाय की क्या अपेक्षा है?'
'चिलचिलाती धूप है। पथिक चल रहा है। एक सघन पेड़ आया। ठंडी छांह देखी और पथिक ठहर गया। उसकी स्थिति में निमित्त बनी छाया। इसी प्रकार जो स्थिति में निमित्त बनता है, वह तत्त्व अधर्मास्तिकाय है।'
'भंते! तब आकाश का क्या कार्य होगा?'
'आकाश आधार देता है, स्थिति नहीं। गति और स्थिति दोनों उसी में होते हैं।'
'भंते! फिर पुद्गलास्तिकाय क्या है?'
'इस लता पर लगे फूल को देख रहे हो?'
'भंते! हां, इसका लाल रंग देख रहा हूं।'
'इसकी विशेषता क्या है?'
'भंते! गंध।'
'यह मधुमक्खी क्यों भिनभिना रही है?'
'भंते! इसका रस लेने के लिए।'
'इसका स्पर्श कैसा है?'
'भंते! बहुत कोमल।'
'कालोदायी! जिस वस्तु में वर्ण, गंध, रस और स्पर्श होते हैं, उसे मैं पुद्गलास्तिकाय कहता हूं।'
'भंते! धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय और आकाशास्तिकाय पर कोई जीव बैठ सकता है? खड़ा रह सकता है? लेट सकता है?'
'नहीं, ऐसा नहीं हो सकता। केवल पुद्गल पर ही कोई बैठ सकता है, खड़ा रह सकता है और लेट सकता है।'
भगवान का उत्तर सुन कालोदायी का संदेह दूर हो गया। वह भगवान् के पास प्रव्रजित हो गया। ये कुछ घटनाएं प्रस्तुत करती हैं मुक्त मानस और मुक्त द्वार के उन्मुक्त चित्र।
समन्वय की दिशा का उद्घाटन
जल और अग्नि में प्राकृतिक वैर है। दोनों एक साथ नहीं रह सकते। अग्नि उष्ण है और जल शीत। शीत उष्ण को मिटा देता है, जल अग्नि को बुझा देता है। उष्ण और शीत में कोई सम्बन्ध नहीं है? जल अग्नि को बुझा देता है, इसलिए इनमें सम्बन्ध की स्थापना कैसे की जा सकती है? जल भी पदार्थ है और अग्नि भी पदार्थ है। पदार्थ को पदार्थ के साथ संबंध नहीं होने की बात कैसे कही जा सकती है?
समस्या के दोनों तटों का पार पाने के लिए समन्वय का सेतु खोजा गया। समन्वय दो सम्बन्धों के व्यवधान को जोड़ने वाला सूत्र है। भगवान् महावीर ने उष्ण और शीत के बीच समन्वय की स्थापना की। उस सिद्धान्त के अनुसार उष्ण उष्ण ही नहीं है, वह शीत भी है और शीत शीत ही नहीं है, वह उष्ण भी है। उष्ण और शीत—दोनों सापेक्ष हैं। मक्खन को पिघलाने वाली अग्नि की ऊष्मा मक्खन के लिए उष्ण है और लोहे के लिए उतनी उष्ण नहीं है; वह अग्नि की साधारण ऊष्मा से नहीं पिघलता।
विश्व के जितने तत्त्व हैं, वे परस्पर किसी न किसी सम्बन्ध सूत्र से जुड़े हुए हैं। कोई वस्तु दूसरी वस्तु से सर्वथा सदृश नहीं है और सर्वथा विसदृश भी नहीं है। हम कुछ वस्तुओं को सदृश मानते हैं और कुछ को विसदृश। इसका हेतु वस्तु की वास्तविकता नहीं है; यह हमारी दृष्टि का अन्तर है। हम सदृशता देखना चाहते हैं तब उसे भी देख लेते हैं और विसदृशता देखना चाहते हैं तब उसे भी देख लेते हैं। वस्तु में दोनों हैं, इसलिए जिसे देखना चाहें उसका मिलना स्वाभाविक बात है।