मानवता के मसीहा आचार्य श्री तुलसी

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प्रदीप छाजेड़, बोरावड़

मानवता के मसीहा आचार्य श्री तुलसी

गुरुदेव तुलसी का जीवन हमको यह बात बताता है कि कलियुग में भी सतयुगी पुरुष आते हैं और अपनी ही लीक बनाते हैं। उनमें जनमानस के उत्थान की तड़प होती है । उनकी विसंगतियों से, समस्याओं से झड़प होती है और समाधान की राह निकलती है। उनको अपने मान,अपमान की परवाह नहीं होती। उनमें अपने गुणगान की, सम्मान आदि की भूख नहीं होती। वे मसीहा बनकर आते हैं, कितनों का उद्धार कर जाते हैं, कितनों का सुधार कर जाते हैं, मानवता का भंडार भर जाते हैं, और अंत में अमर हो जाते हैं। आचार्य श्री तुलसी बीसवीं सदी के उन विशिष्ट संतों में अग्रगण्य थे जिनकी दृष्टि केवल धर्म तक सीमित नहीं थी , बल्कि सामाजिक परिवर्तन के व्यापक आगमों को भी समेटती थी। उनका व्यक्तित्त्व बहुत बहुआयामी था।
आध्यात्मिक साधना, नैतिक जागरण और समाजिक चेतना का अद्भुत समन्वय उनके कृतित्व में स्पष्ट दिखाईं देता हैं । उन्होंने निरन्तर यह प्रयास किया की मनुष्य अपनी अन्तर्निहित नैतिक शक्ति की पहचानकर उसे व्यक्तिगत उत्थान तथा समाज- सुधार की दिशा में प्रयोग करें । तुलना के विष को कृतज्ञभावों से काटो यानि अपने पास जो है उसके लिए कृतज्ञता भाव रखो। उनके जीवन और कार्य ने यह सिद्ध किया हैं कि सच्ची आध्यात्मिकता व्यवहार में उतरकर ही समाज को नई दिशा प्रदान कर सकती हैं। आचार्य श्री तुलसी जैसे संत युग दृष्टा होते हैं, वे कर्मठ श्रृष्टा होते हैं। वे संतप्त सृष्टि के कष्ट निवारक अमृत वृष्टा होते हैं। गुरुदेव तुलसी हूबहू ऐसी ही विरल विभूति थे।वे भैक्षवगण के सक्षम पट्टधर संघ हृदय की अनुभूति थे।
समाजोत्थान एवं संघ विकास में समन्वय था । ऐसे संघ पुरुष को पा कर हम सभी धन्य हुए। उनके जीवन का हर पृष्ठ पौरुष की कहानी है। आचार्य श्री तुलसी ने अणुव्रत-आंदोलन के माध्यम से एक अनूठी धर्मक्रांति की शुरुआत की। आज लगभग तीस वर्ष बाद भी तुलसी तो तुलसी ही थे, हम सब यह कहते है। उन्हें हमारा सादर नमन हम भी उस पथ पर सदा गमन करें।