आचार्य तुलसी की दूरदर्शिता की यशोगाथा

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शासनश्री साध्वी कंचनप्रभा

आचार्य तुलसी की दूरदर्शिता की यशोगाथा

आचार्य तुलसी जैन समाज के एक शक्ति-संपन्न आचार्य थे। उन्होंने भगवान महावीर की वाणी को स्वीकार करते हुए आगम वाणी के आधार पर संयम-प्रधान जीवन शैली को प्रतिष्ठित किया और अणुव्रत के माध्यम से छोटी-छोटी बातों को जीवन में उतारकर जनता को शांति से रहने का संदेश दिया। उन्होंने वर्षों पहले चेतावनी देते हुए कहा था कि यह संयमहीन उपभोक्तावादी संस्कृति कहीं हिंसा का रूप न ले ले। आज हम जो देख रहे हैं, वह मानव मन की क्रूरता का ही प्रतीक है। उन्होंने अपने ज्ञानबल से जो कहा था, वह आज हम प्रत्यक्ष देख रहे हैं।
सत्य की प्रयोगशाला– अणुव्रत आंदोलन इसी की ही फलश्रुति है। उस शिखर पुरुष की वचन-सिद्धि में बहुत दूरदर्शिता होती थी। उनका जो भी वचन निकला, वह हमेशा सत्य के साथ अलौकिक रहा। 'सत्यं शिवं सुंदरम्' के साथ उनका मार्गदर्शन पूरे संघ में चेतना का ऊर्ध्वारोहण बन गया।
युग बोध– उनका शासनकाल तथा उनकी प्रेरक शिक्षाएं लक्ष्य निर्धारण का विशेष समय रहा। उन्होंने न केवल सैकड़ों विद्वानों को तैयार किया, बल्कि जगह-जगह भेजकर अध्यात्म और संस्कृति को जन-जन तक पहुंचाया। आज हजारों साधु-साध्वियां महावीर की वाणी की अलख जगा रहे हैं। जैन विश्वभारती यूनिवर्सिटी से सैकड़ों साध्वियां पी.एच.डी. करके विश्व के कोने-कोने में महावीर के सिद्धान्तों और अहिंसा दर्शन को पहुंचा रही हैं। इस अहिंसा दर्शन की आज बहुत बड़ी प्रासंगिकता है।
पर्यावरण विज्ञाता– उन्होंने कहा था कि धरती, हवा, पानी और वनस्पति सृष्टि-संतुलन के आधारभूत तथ्य हैं। ये जैसे हैं वैसे ही बने रहेंगे, तभी सृष्टि का संतुलन बना रह सकता है। इनमें गड़बड़ी होने से संतुलन बिगड़ने का खतरा बढ़ता है। विस्फोटक साधनों के धुएं से धरती और सूरज के बीच की ओजोन परत (छतरी) प्रभावित होती है। उसके ह्रास होने से धरती पर जीवन जीने की संभावना कम होती जाएगी। उन्होंने कहा था— इस प्राकृतिक आपदा को पैदा करने वाला भी मानव ही तो है। बढ़ती हुई खोखली इच्छाएं ही इस दुर्बलता की द्योतक हैं।
असुरक्षित संयम बढ़ाता है तनाव– मनुष्य की बढ़ती हुई खोखली इच्छाएं ही उसका संकट बनी हुई हैं। संयम का शाश्वत सिद्धान्त ही सृष्टि को सुरक्षित रख सकता है। ऐसे हिंसक वातावरण में मनुष्य कभी चैन और सुख नहीं पाएगा। आज हर व्यक्ति बेचैन है कि पता नीं कल क्या होगा।
युग परिवर्तन– परिवर्तनशील इस पांचवें आरे में आई हुई कमजोरियों से बचने के लिए उन्होंने कहा था— स्वाध्याय, ध्यान और त्याग की भावना बढ़ेगी, तभी सुख-समृद्धि बढ़ेगी तथा हर समस्या आपसे दूर रहेगी। आपने निर्जरा का सन्देश देकर मनुष्य मात्र के जीवन में संस्कारों का सृजन किया है।
अनुशासन संवारता है जीवन– अनुशासन जीवन की विशिष्ट कला है। इसके बिना जीवन अधूरा है। परिवार, समाज और व्यक्ति जब अनुशासित रहते हैं, तभी हर जगह शोभा प्राप्त करते हैं। जहां इसकी महत्ता (मूल्यवत्ता) है, वहां हर व्यक्ति सुरक्षित है। इस कलिकाल में स्वयं पर स्वयं का नियंत्रण ही सुख की शैया है।
यशस्वी कार्यशैली– गणाधिपति पूज्य गुरुदेव श्री तुलसी जी ने अपने ऊर्जा-बल से समाज को अनेक योजनाएं दीं और समय से पहले ही सचेत करते हुए कहा था कि अगर व्यक्ति का निर्माण नहीं होगा, तो परिवार और समाज भटक जाएगा। कुछ दशक पहले उन्होंने जो कहा था, आज वही घटित हो रहा है। उनका दिशाबोध आज भी अत्यंत प्रासंगिक है। उन्होंने अनेक सभा-संस्थाओं के माध्यम से समाज कल्याण के लिए युवावर्ग को तैयार किया। उत्साह और उमंग भरकर महिला समाज को प्रगति के शिखर पर आरोहण करने का उपदेश दिया। मुमुक्षु बहनों को श्रमणी दीक्षा प्रदान कर विश्व में एक नई हलचल पैदा की। आगम-सम्पादन अपने आप में जैन समाज का बहुत बड़ा गौरव है। तीसवें महाप्रयाण के इन क्षणों में हम उनके द्वारा प्रदत्त शिक्षाओं पर चलते हुए यह महसूस करते हैं कि भले ही वे देह रूप में हमारे सामने नहीं हैं, मगर आदर्श रूप में प्रतिष्ठित उनका आभा-मण्डल हमारे लिए हमेशा प्रेरणास्रोत है। उनका आशीर्वाद सबको मिलता रहे; क्योंकि वे ऐसे पहले आचार्य हैं, जिन्होंने सम्प्रदाय-मुक्त धर्म को प्रतिपादित किया।