गुरुवाणी/ केन्द्र
भगवान महावीर-गौतम के प्रश्नोत्तर में है हर शंका का समाधान :आचार्यश्री महाश्रमण
जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अधिशास्ता, शांतिदूत, युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी ने जैन विश्व भारती के सुरम्य परिसर में योगक्षेम वर्ष के संदर्भ में आयोजित प्रातः कालीन मंगल प्रवचन कार्यक्रम में चतुर्विध धर्मसंघ को ‘द्वादशांगविद भगवान गौतम’ विषय पर पावन देशना प्रदान की। उत्तरज्झयणाणि आगम के प्रसंगों को उद्घाटित करते हुए आचार्यश्री ने कहा कि भगवान महावीर के प्रमुख गणधर भगवान गौतम बारह अंगों के वेत्ता थे। वर्तमान समय में भले ही द्वादशांगविद् मिलना मुश्किल है, परन्तु साधु-साध्वियों और समणियों को एकादशांगविद् (ग्यारह अंगों का वेत्ता) या किसी एक आगम का वेत्ता बनने का पुरुषार्थ अवश्य करना चाहिए।
श्रावस्ती नगरी में दो महान संतों का दिव्य विहरण : आचार्यश्री ने कालक्रम और इतिहास के झरोखे से दो महान परंपराओं के संतों के मिलन की पृष्ठभूमि समझाते हुए निम्नलिखित मुख्य बिंदु स्पष्ट किए।
१. केशी कुमार श्रमण का आगमन : भगवान पार्श्व की परंपरा के महान व्यक्तित्व, विद्या और आचार के पारगामी तथा अतीन्द्रिय ज्ञान से संपन्न केशी कुमार श्रमण अपनी शिष्य संपदा के साथ ग्रामानुग्राम विहार करते हुए श्रावस्ती नगरी के तिंदुक नामक उद्यान में पधार कर प्रवास करने लगे।
२.भगवान महावीर का विहरण: उसी समय दूसरे महान संत भगवान महावीर, जो सर्व लोक में विश्रुत थे, तीर्थंकर और सर्वज्ञ थे, वे भी विहरण शील थे। भगवान महावीर वीतराग और साधना के शिखर पर विराजमान थे।
द्वादशांगविद् भगवान गौतम और उनके प्रश्नोत्तर: लोक प्रदीप भगवान महावीर के प्रमुख शिष्य इंद्रभूति गौतम की ज्ञान संपदा और उनकी विशेषताओं को रेखांकित करते हुए पूज्यप्रवर ने बताया:
१. विद्या-आचार के पारगामी : भगवान महावीर के इस महायशस्वी शिष्य का नाम इंद्रभूति गौतम था। वे भगवान महावीर के प्रमुख शिष्य और गणधर थे, जिनके पास विशाल शिष्य संपदा थी।
२. बारह अंगों के वेत्ता : भगवान गौतम परम ज्ञानी और द्वादशांगविद् (बारह अंगों के ज्ञाता) थे। वे सदा भगवान महावीर से प्रश्न करते थे। इतने प्रश्न संभवतः किसी अन्य ने प्रभु से नहीं किए।
३. आगमों का आधार : आज आगमों में संकलित इन्हीं प्रश्नोत्तरों के माध्यम से ही चारित्रात्माओं और समाज को सच्चा बोध व सही राह मिल पा रही है।
आगम कार्य, अर्थ की गहराई और आचार्यों की ज्ञान संपदा : आचार्यश्री ने आगमों के संपादन कार्य में लगे संतों को मार्गदर्शन देते हुए प्रमुख बातें कहीं:
१. अर्थ खोजने की कला : जो चारित्रात्माएं आगमों के कार्य में संलग्न हैं, उन्हें आगम की गहराई में जाने का अवसर मिलता है। एक शब्द के अनेक अर्थ हो सकते हैं, पर ऐसा सटीक अर्थ खोजना चाहिए जिससे संस्कृत छाया और अनुवाद में अभेद (समानता) रहे।
२. आचार्य भिक्षु का अनूठा तरीका : वर्तमान समय में महामना आचार्य श्री भिक्षु के साहित्य को देखने से पता चलता है कि उनके पास कितना अगाध ज्ञान था। उनका समझाने का तरीका अद्भुत था; वे दृष्टांत के माध्यम से अपनी बात सामने वाले को आसानी से समझाकर समाधान कर देते थे और उनमें अभय का भाव था।
३. जयाचार्य से महाप्रज्ञ जी तक की संपदा : इसी प्रकार प्रज्ञा पुरुष श्रीमज्जयाचार्य का भी अपना विशिष्ट ज्ञान और वैदुष्य था। परम पूज्य आचार्य श्री तुलसी और आचार्य श्री महाप्रज्ञ जी के पास भी विपुल ज्ञान संपदा थी।
साधु-साध्वियों और समणियों को स्वाध्याय की प्रेरणा : प्रवचन के अंत में आचार्यश्री ने ज्ञान के विकास और आगम वेत्ता बनने के लिए पावन पाथेय प्रदान किया।