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साहस, संकल्प, समता व सकारात्मक सोच के पर्याय : आचार्य भिक्षु
दुनिया को बदलने, जीवन को आलोक देने और नए पथ का निर्माण करने के लिए साहस, संकल्प, समता, सकारात्मक सोच और सत्य के ध्येय की आवश्यकता होती है। तेरापंथ के आद्य प्रणेता आचार्य भिक्षु का व्यक्तित्व इन्हीं असाधारण गुणों का समाहार था। उनके जीवन में 'चार सकार' का दुर्लभ योग था, जिसने उन्हें अध्यात्म-जगत में 'सिंह पुरुष' के रूप में प्रतिष्ठित किया।
१. साहस
१. विपरीत परिस्थितियों का सामना : आचारांग-सूत्र के अनुसार, 'वीर पुरुष ही महापथ का अनुगमन करते हैं।' आचार्य भिक्षु ने जब नए पथ (तेरापंथ) की शुरुआत की, तब प्रकृति, समाज और उनके अपने लोग भी खिलाफ हो गए। लेकिन साहस के पुरोधा होने के कारण विरोधों के भूचाल भी उनके कदमों को रोक नहीं पाए।
२. सत्य कहने में निर्भीकता: साहसिक मनोवृत्ति के कारण वे किसी की भी गलती का बखान करने से घबराते नहीं थे। वे अपने आराध्य भगवान महावीर की छद्मस्थ अवस्था की एक चूक का भी सार्वजनिक बखान करते थे।
३. मुनि भारमलजी के साथ प्रसंग : जब मुनि भारमलजी ने बढ़ते विरोध को देखते हुए भगवान महावीर की चूक का सार्वजनिक बखान न करने का निवेदन किया, तो आचार्य भिक्षु ने पूछा— 'क्या मैं गलत कह रहा हूँ?' भारमलजी के 'नहीं' कहने पर स्वामीजी ने दृढ़ता से कहा— 'फिर घबराने की कहाँ जरूरत है?'
२. संकल्प
१. वज्र जैसा अडिग संकल्प : आचार्य भिक्षु वज्रसंकल्पी और फौलादी सीने वाले पुरुष थे। उनकी धर्मक्रांति को रोकने या उनके संकल्प को डिगाने के अनेक प्रयास किए गए, पर कोई भी उन्हें अपने मार्ग से च्युत नहीं कर सका।
२. पाली चातुर्मास का प्रसंग : पाली के बावेचाजी और हाकिम जेठमलजी ने उन्हें वहां से निकलवाने की नाकाम कोशिश की। जब वे सफल नहीं हुए, तो उन्होंने रात्रि में स्वामीजी के व्याख्यान के समय ढोल बजाकर और नृत्य-गायन कर विघ्न डालना शुरू किया।
३. विरोधियों को थकाया : श्रावकों ने जब स्वामीजी से अन्य जगह चलने का निवेदन किया, तो उन्होंने कहा— 'नहीं भाई! यही स्थान उपयुक्त है।' कई दिनों के व्यवधान के बाद अंततः विरोधी खुद थक गए और उन्होंने यह हरकत बंद कर दी। जैसे काली घटाएं सूर्य के अस्तित्व को नहीं मिटा सकतीं, वैसे ही विरोध उनके संकल्प को नहीं झुका पाए।
३. समता
१. पृथ्वी जैसी सहनशीलता: दशवैकालिक सूत्र के अनुसार, 'पृथ्वी सब कुछ सहन करती है।' आचार्य भिक्षु की समता भी वैसी ही थी। जब किसी ने कहा कि 'भीखणजी करोड़ कसाइयों से भी बुरे हैं,' तो उन्होंने समभाव से कहा— 'हम ऐसे ही हैं। कसाई तो बकरों को मारते हैं पर उनका कुछ नहीं बिगाड़ते, हम तो उनके श्रावकों को समझाकर उनके मत का खंडन करते हैं, इसलिए वे ऐसा कहते हैं।'
२. कटु वचनों को फूलों की तरह लिया : उन्हें केवल गोचरी, स्थान या वस्त्र के कष्ट ही नहीं मिले, बल्कि तीव्र वाक्-प्रहारों का भी सामना करना पड़ा। लोग उन्हें गोशालक, निन्हव और दान-दया के विरोधी कहकर खरी-खोटी सुनाते थे।
३.भगवान महावीर की वाणी का प्रभाव : भगवान महावीर ने कहा था कि दूसरों के दुर्वचन पर क्रोधित होने वाला भिक्षु मूर्ख के समान हो जाता है, अतः कांटों जैसी भाषा सुनकर भी मौन रहकर उपेक्षा करनी चाहिए। आचार्य भिक्षु ने इस वाणी को आत्मसात किया, जिससे वे समता के महासुमेरु और क्षमासुर बने।
४. सकारात्मक सोच
१. सफलता और सुख का टॉनिक : सकारात्मक सोच रखने वाला व्यक्ति कभी बुराई नहीं देखता, केवल अच्छाई देखता है। आचार्य भिक्षु के सामने कई ऐसे कड़वे प्रसंग आए जो निराशा पैदा कर सकते थे, लेकिन उनकी सकारात्मक सोच ने उन्हें हमेशा प्रसन्नता का उपहार दिया।
२. हाट से निकाले जाने का प्रसंग : पाली में एक हाट में ठहरने के बाद, किसी अन्य संत के कहने पर गृहस्वामिनी ने स्वामीजी से चातुर्मास से पहले ही जगह खाली करने को कह दिया। आचार्य भिक्षु बिना किसी विवाद के स्थिति को भांपकर वहां से उदयपुरिया बाजार की एक मेड़ी में चले गए, जहाँ उनका व्याख्यान बहुत सफल रहा।
३. उपकार की अनूठी भावना : कुछ दिनों बाद भारी वर्षा के कारण उस पहली हाट की छत गिर गई। यह जानकर आचार्य भिक्षु ने द्वेष रखने के बजाय कहा— 'जिन्होंने हमसे हाट छुड़ाई, उन्होंने हमारे ऊपर उपकार ही किया है। अगर हम वहां होते, तो पता नहीं आज हमारा क्या होता।'इस सकारात्मक चिंतन ने उनके आभामंडल को और प्रभावशाली बना दिया।
निष्कर्ष
आचार्य भिक्षु साहस, संकल्प, समता एवं सकारात्मक सोच के जीवंत आदर्श थे। जयाचार्य ने *'भिक्षु जस रसायन' में उनके लिए सही कहा है कि वे सिंह की तरह वीर, सुमेरु की तरह धैर्यशाली और अपनी टेक निभाने वाले बांके सम्राट थे। ये 'चार सकार' हमारे साधनामय जीवन को उद्भासित करने और वीतरागता की ओर बढ़ने के प्राणवान सूत्र हैं।