रचनाएं
'मर्यादा के महाप्राण'
जैन शासन के अम्बर पर, जो बनके दिवाकर छाए थे,
वह भिक्षु थे जो दुनिया में, सत्य की अलख जगाए थे।
जहाँ रूढ़ियों का जंजाल खड़ा, पाखंड की ऊँची दीवारें,
वहाँ आगम के मंथन से, नव-चेतना के सुर लाए थे।।१।।
न रुके कभी, न झुके कभी, संकट में भी अविचल ही रहे,
अपमान के तीखे बाणों को, वे समता रस से सहते रहे।
भूखे-प्यासे रहकर भी जो, आत्म-ध्यान में लीन रहे,
तपती बालू के आसन पर, वे घोर तपस्या करते रहे।।२।।
तेरह संतों की शक्ति से, जो तेरापंथ की नींव धरी,
प्रभु महावीर के शासन में, भिक्षु ने शुद्ध साधना वरी।
'प्रभो! यह सब कुछ तेरा है', कह अपना शीश नवाया था,
लौकिक-लोकोत्तर दान का, जिसने सच्चा मर्म सिखाया था।।३।।
एक गुरु और एक विधान की, मर्यादा की जो रीति दी,
निज पर शासन करने की, अद्भुत आत्मिक वो प्रीति दी।
भारमल, जयाचार्य, तुलसी, महाप्रज्ञ ने जिसे बढ़ाया,
सद्भावना, नैतिकता का, जन-जन में सुंदर फूल खिलाया।४।।
ग्यारहवें अधिनायक बनकर, अब महाश्रमण अनुशासक हैं,
उसी भिक्षु की मर्यादा के, वे परम प्रखर प्रकाशक हैं।
जो रोपा था इक बीज कभी, वह आज वटवृक्ष महान है,
इस पावन भिक्षु परंपरा को, हमारा कोटि-कोटि प्रणाम है।।५।।
जय महावीर! जय भिक्षु! जय महाश्रमण!
जय दीपां नंदन! जय बालू नंदन! जय गण चंदन!