संपादकीय कलम से.....

संपादकीय

सम्पादकीय

संपादकीय कलम से.....

प्रिय धर्मप्राण बंधुओं...
समय के चक्र में कुछ क्षण ऐसे आते हैं, जो इतिहास की सीमाओं को लांघकर अमर हो जाते हैं। आज 'तेरापंथ' टाइम्स का यह विशेषांक हमारे अंतस को उसी अमरता और गहरी आध्यात्मिक चेतना से स्पंदित कर रहा है। हमारे आराध्य, आद्य प्रवर्तक क्रांतिधर्मी स्वामी श्री भिक्षु की त्रिजन्मशताब्दी की यह पावन पूर्णाहुति केवल एक उत्सव का समापन नहीं, बल्कि उस वैचारिक क्रांति के पुनर्जागरण का क्षण है, जिसने ढाई सौ वर्ष पूर्व समाज को शुद्धाचार की नई परिभाषा दी थी। कंटालिया में जनमे और सिरियारी की भूमि पर महाप्रयाण कर 'सिरियारी के संत' कहलाए स्वामीजी ने सत्य और अहिंसा का जो राजपथ निर्मित किया, आज उसी पर चलकर हमारा तेरापंथ संपूर्ण विश्व-क्षितिज पर दैदीप्यमान है।
आचार्य भिक्षु एक ऐसे युगद्रष्टा थे, जिनके भीतर बुराइयों के विरुद्ध चट्टान की तरह खड़े रहने की प्रतिरोधात्मक शक्ति जागृत थी। तत्कालीन समाज में फैली शिथिलता को दूर करने के लिए उन्होंने सुख-सुविधाओं को ठुकराकर सत्य के मार्ग पर एकाकी चलने का साहसिक निर्णय लिया। 'एक आचार, एक अनुशासन और एक आचार्य' का जो अद्वितीय सिद्धांत उन्होंने दिया, वही आज हमारे इस विराट धर्मसंघ का प्राणतत्व है। नवम अधिनायक आचार्य श्री तुलसी के वात्सल्य, दसवें आचार्य श्री महाप्रज्ञ की प्रज्ञा और वर्तमान में हमारे ग्यारहवें अनुशास्ता, युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी की पावन निश्रा में—जो आज लाडनूं की धरा को अपने चातुर्मास से पावन कर रहे हैं—यह संघ आज संयम और सदाचार के नए सोपान तय कर रहा है।
इस ऐतिहासिक मोड़ पर सबसे जीवंत प्रश्न यह है कि स्वामीजी के इन सिद्धांतों को हमारी आज की 'युवा शक्ति' अपने जीवन में कैसे आत्मसात करे? स्वामीजी का संपूर्ण जीवन आत्म-विश्वास का साक्षात दस्तावेज है। जब केलवा की उस अंधेरी कोठरी में उन्होंने प्रवेश किया, तब उनके पास कोई भौतिक कवच नहीं, बल्कि कठोर साधना का अटूट संबल था, तो स्वामीजी के जीवन से ये तीन सूत्र अवश्य अपनाने होंगे:
भीड़ से अलग सत्य का साहस: स्वामीजी ने सिखाया कि यदि आप सत्य के साथ हैं, तो अकेले खड़े रहने से भी मत डरिए।
क्षण-जागरूकता (टाइम मैनेजमेंट): स्वामीजी का मूलमंत्र था— 'खणं जाणाई पंडिए'। यदि युवा शक्ति समय के हर पल की कीमत पहचान ले, तो वह अवसाद (Stress) से मुक्त होकर करियर और जीवन दोनों में शिखर छू सकती है।
आंतरिक अनुशासन: स्वामीजी का 'एक अनुशासन' का नियम हमारे व्यक्तिगत जीवन के लिए भी है। जब आधुनिक तकनीकी सोच के साथ आचार्य भिक्षु जैसा कड़ा आत्म-नियंत्रण जुड़ जाएगा, तब एक चरित्रवान व्यक्तित्व का निर्माण होगा।
आइए, इस त्रिजन्मशताब्दी पूर्णाहुति के पुनीत अवसर पर, हम सब लाडनूं में विराजे हमारे अनुशास्ता के चरणों में यह संकल्प निवेदित करें कि हम केवल भिक्षु के सिद्धांतों के प्रशंसक नहीं, बल्कि उनके जीवन मूल्यों के सच्चे संवाहक बनेंगे।
–कार्यकारी संपादक, तेरापंथ टाइम्स)