दीपा-नंदन मन भाए

रचनाएं

साध्वी उदित प्रभा

दीपा-नंदन मन भाए

दीपा-नंदन मन भाए, मानस कलियाँ विकसाए,
हर्षित हैं दसों दिशाएं, धरती अम्बर गुंजाए।
ये शासन तो लगे हमें प्यारा है, जीवन का सहारा है...
कंटालिया की पुण्य भूमि पर, सिंह-स्वप्न स्यूं जन्म लियो,
मारवाड़ की शुष्क धरा पर, कल्पतरु फलवान बन्यो।
वा धरती की पुण्याई, माता दीपा हरसाई...
ये शासन तो लगे हमें प्यारा है...
विद्यालय में चरण नहीं, विद्या ने तेरा वरण किया,
प्रत्युत्पन्न मति से तुमने, जन-जन का भ्रम दूर किया।
तुम धर्म संघ के प्रहरी, शासन की नींवें गहरी...
ये शासन तो लगे हमें प्यारा है...
सत्य साधना करने खातिर, संघर्षों को झेल लिया,
'मर देस्यां पूरा तप-जप', स्यूं मन में था संकल्प किया।
साहस था अजब तुम्हारा, कठिनाइयों से नहीं हारा...
ये शासन तो लगे हमें प्यारा है...
मर्यादाएं कठिन तुम्हारी, मर्यादित जीवन-शैली,
घोर विरोधों में भी रहती, अनुपम समता अलबेली।
दीर्घ दृष्टि सदा निहारी, आग्रही बुद्धि भी हारी...
ये शासन तो लगे हमें प्यारा है...
भिक्षु शासन नंदनवन की, गण गरिमा पल-पल गाते,
महाश्रमण की शीतल छाया, शांति सदन में हरसाते।
त्रिशताब्दी वर्ष सुहाना, अविचल अविकल सुख पाना...
ये शासन तो लगे हमें प्यारा है, जीवन का सहारा है...
तर्ज : सूरज कब दूर गगन से...