अध्यात्म के महासूर्य : आचार्य भिक्षु

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डॉ. साध्वी सरलयशा

अध्यात्म के महासूर्य : आचार्य भिक्षु

तीन सौ वर्ष पूर्व अवतरित आचार्य भिक्षु के पारदर्शी सूक्ष्म सिद्धांतों को आत्मसात करने के लिए 'भिक्षु त्रि-जन्म शताब्दी' का वर्षभर चलने वाला महान उत्सव मनाया गया। आडंबरों से मुक्त इस उत्सव में युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने अपनी धवल सेना और अनुयायियों को 'गहरे पानी पैठ' का संबोध देकर भिक्षुमय बनने का आह्वान किया।
विशिष्ट परिवेश और जन्म की सार्थकता
विशिष्ट जन्म: आषाढ़ त्रयोदशी के दिन माता
दीपां की कुक्षि से बालक भिक्षण (भिवण) का अवतरण हुआ। अनेक शुभ-मंगल चिह्नों से युक्त उनकी
शरीर-रचना तीर्थंकरों के जन्मजात लक्षणों की स्मृति कराने वाली थी।
जागृति और त्याग: शाह शालिभद्र की तरह उन्होंने भरी जवानी में सपत्नीक संयम अंगीकार करने का संकल्प किया और भोग पर त्याग की विजय का परचम फहराया।
क्रांति का सूत्रपात: आचार्य भिक्षु का जन्म जिनशासन के अभ्युदय, सत्य क्रांति, धर्मक्रांति और शुद्ध साध्वाचार का प्रतीक सिद्ध हुआ। वे मर्यादा और अनुशासन के शिखर पुरुष कहलाए।
सत्य संधित्सु (सत्य के पुजारी)
आचार्य भिक्षु संयम, तप और त्याग के जीवंत प्रतीक थे। उनका फौलादी संकल्प था—'मर पूरा देस्या, आत्मा रा कारज सारस्या।'
1. कठोर साधना के बल पर उन्होंने तेरापंथ धर्मसंघ की स्थापना की।
2. उन्होंने तात्विक तथ्यों को युक्तियों और उपमाओं के माध्यम से लोगों को समझाया।
3. पाखंडियों और वेषधारी धर्म के ठेकेदारों पर कड़ा प्रहार कर धर्म का तेजस्वी रूप प्रकट किया।
अद्वितीय व्यवस्था कौशल
संघ की सुदृढ़ता और चिरजीविता के लिए उन्होंने व्यवस्था पक्ष को सबसे मजबूत आधार बनाया:
एकता का सूत्र: उन्होंने 'एक आचार, एक विचार एवं एक आचार्य' की सुंदर व्यवस्था का सूत्रपात किया।
अनुशासन: मर्यादाओं के सुरक्षा-कवच से संघ के प्रत्येक सदस्य को सुरक्षित और शक्ति-संपन्न बनाया तथा ‘आणाय मामगं धम्मं’ का बोध-पाठ हृदयंगम करवाया।
वैश्विक पहचान : उनके इसी व्यवस्था कौशल के कारण पीढ़ी-दर-पीढ़ी तेरापंथ धर्मसंघ निखरता गया, जिसकी बेमिसाल बानगी वर्तमान में आचार्य प्रवर के नेतृत्व में भी दिखाई देती है।
जॉर्ज एलेन के शब्दों में, 'सेहत, खुशी और सफलता हर आदमी के जूझने पर निर्भर होती है।' इस सत्य को सत्यापित करने वाले आचार्य भिक्षु का फौलादी साहस आने वाली सदियों का मार्ग निर्धारित करता रहेगा।