रचनाएं
भविष्यदृष्टा आचार्य भिक्षु
तेरापंथ धर्मसंघ एक प्राणवान संघ है, जिसका मुख्य आधार 'अनुशासन' है। स्व-अनुशासन ही नेतृत्व क्षमता को जन्म देता है। महान वैज्ञानिक आइंस्टीन ने भी लिखा है—'अनुशासन से हर जगह विजय प्राप्त की जा सकती है।' इसी अनुशासन व मर्यादा के निर्माता आचार्य भिक्षु थे, जिनका नाम ही मंगल मंत्र है। आचार्य भिक्षु एक सिद्धयोगी पुरुष थे, जिनके संस्कारों में योगसिद्धियां चलती थीं। एक श्वास में पूरा 'लोगस्स' व 'णमोकार मंत्र' का स्पष्ट जप करना उनकी प्राणवान साधना थी, जिसे 'रत्न मंत्र' कहा गया। उनके जप से असंभव कार्य भी संभव हो जाते थे।
संतुलन का नाम ही अनुशासन है
प्रतिभा, प्रज्ञा और पुरुषार्थ के धनी स्वामी जी ने सत्य को व्यवहार के धरातल पर जिया। अनुशासन के माध्यम से ही विनय, समर्पण और सहिष्णुता के आदर्शों को जीवन में उतारा जा सकता है।
संघ के गणस्तम्भ
तेरापंथ में अनुशासनप्रिय साधुओं को प्रथम स्थान मिला। मुनि सतयुगजी, मुनि बेणीरामजी, मुनि हेमराजजी और मुनि रायचंदजी संघ के 'गणस्तम्भ' कहलाए। सर्व-आत्मसमर्पण करने वाले मुनि भारमल को भी गुरुदेव से विशेष आशीष मिला।
शारीरिक व मानसिक संतुलन
जैसे हमारे शरीर की 600 खरब कोशिकाओं का नियंत्रण मस्तिष्क करता है, वैसे ही तेरापंथ संघ का नियंत्रण एक आचार्य की आज्ञा से होता है। अनुशासन ही प्राण शक्ति का संतुलन है।
नई संभावनाओं के द्वार व कठिन राह
आचार्य भिक्षु का स्वनियंत्रण ही मर्यादा को प्रतिष्ठित करता था। उनके विचारों की यथार्थता को विरोधियों ने भी स्वीकार किया। स्थान, आहार-पानी और वस्त्रों के भारी अभाव के बावजूद उनका हर कदम अध्यात्म से सुशोभित रहा और उनकी बनाई मर्यादाएं हीरे की तरह निखरती गईं।
कठिनाइयों में भी मंजिल को ढूंढा
स्वामी जी का जीवन एक योद्धा जैसा था, जो संघर्षों के आगे कभी झुके नहीं।
तप-त्याग की गाथा
बगड़ी और मारवाड़ की धरती पर उन्होंने पांच वर्षों तक आहार-प्राप्ति के लिए असाधारण कष्ट झेले, पर कदम पीछे नहीं हटाए।
संघीय संविधान का निर्माण
उन्होंने मुनि श्री थिरपाल जी और मुनि
श्री फतेचंद जी को 'रत्नाधिक' बनाया।
सिद्धांतों से बिना समझौता किए उन्होंने 'एक आचार, एक विचार तथा एक समाचारी' का दृढ़ निश्चय किया।
अहंकार का विसर्जन
'कोई भी साधु-साध्वी अपना अलग शिष्य न बनाए'—इस कठोर मर्यादा से उन्होंने अहंकार और मम्कार को समूल नष्ट कर दिया।
मौलिक अवधारणाएं
उदार चरित्र के नायक आचार्य भिक्षु ने समाज को अनेक नवीन सिद्धांत दिए–
साध्य और साधन
अशुद्ध साधन कभी भी मोक्ष (साध्य) तक नहीं पहुंचा सकता।
अहिंसा का स्वरूप
पंचेन्द्रिय के पोषण के लिए एकेन्द्रिय (वनस्पति/पृथ्वी आदि) की हिंसा करना सर्वथा अनुचित है। उन्होंने आगमों के आधार पर 'दया और करुणा' के वास्तविक रूप को जन-जन तक पहुंचाया।
प्रमाद को क्षमा नहीं
वे शुद्ध आचार के प्रबल पक्षधर थे और लापरवाही (प्रमाद) को कभी सहन नहीं करते थे।
चंडावल का प्रसंग
जब कुछ साध्वियों द्वारा आवश्यकता से अधिक कपड़ा रखने का संदेह हुआ, तो मुनि अखैराम जी को भेजकर कपड़ा वापस मंगवाया गया। मर्यादा के अनुसार, प्रमाद के कारण उन साध्वियों के 'पानी का जोड़' (प्रायश्चित/तप) को बढ़ा दिया गया।
अंतिम सांस के क्षण
स्वामी जी को मुनि भारमलजी जैसे विनीत शिष्य मिले, जिनका समर्पण बेमिसाल था। आचार्य भिक्षु ने भारमलजी के साथ अपने पवित्र आत्मिक संबंध को स्वीकार किया। अपने अंतिम समय को पहले ही भांपकर आचार्य श्री ने फरमाया—'सभी साधु-साध्वी अब मेरे उत्तराधिकारी मुनि भारमलजी की आज्ञा में चलें।' स्वामी जी का यही अनुशासनात्मक दर्शन आज भी प्रासंगिक है कि संयम ही हर समस्या का समाधान है।
आचार्य श्री महाश्रमण जी के कर्तृत्व
को नमन
आचार्य भिक्षु जन्म त्रिशताब्दी समारोह एवं योगक्षेम वर्ष वर्तमान शासनकाल के स्वर्णिम पृष्ठ हैं। आचार्य श्री महाश्रमण जी की पावन सन्निधि में साधु-साध्वियों के व्यापक प्रशिक्षण और सामूहिक सामायिक जैसे कार्यक्रम संपन्न हुए। 'प्रेक्षा पाथेय' प्रदान करते हुए आपने फरमाया था कि आचार्य भिक्षु के सिद्धांतों को समझते हुए हमें आत्म-चिंतन करना है। जन्म त्रिशताब्दी के अवसर पर इससे बड़ा और कोई उपहार नहीं हो सकता।