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झरोखे से झांकता आचार्य भिक्षु का तपस्वी जीवन
महापुरुष का अन्तःकरण परमार्थ से अभिभूत होता है। वे जैसे अपना श्रेयस चाहते हैं, वैसे ही दूसरों का भी। आचार्य भिक्षु ने श्रेयस का मार्ग चुना और उसे जनता को भी दिखाना चाहते थे। इस मार्ग में अनेक उतार-चढ़ाव आने के बावजूद उन्होंने कभी तितिक्षा को नहीं छोड़ा। उनका जीवन-दर्शन अनेक विधाओं में गुम्फित था, जिसे उनके जीवन के संस्मरण पूरी तरह उजागर करते हैं।
सहनशीलता
धर्म की पहली कसौटी सहनशीलता है, जो अनुकूल-प्रतिकूल स्थिति में समभाव रखना सिखाती है। 'सहन करना मेरा आत्मधर्म है और इससे पवित्रता बढ़ती है'– एक बार आचार्य भिक्षु देसूरी जा रहे थे, तो मार्ग में घाणेराव के लोग मिले। उन्होंने पूछा, 'तुम्हारा नाम क्या है?' आचार्य भिक्षु ने कहा, 'मेरा नाम भीखण है।' तब वे बोले, 'क्या तेरापंथी भीखण तुम ही हो?' आचार्य जी ने हामी भरी। उनमें से एक व्यक्ति बोला, 'गजब हो गया, सुबह-सुबह तुम्हारा मुंह देखा है, इसलिए मैं नरक में जाऊंगा।' आचार्य भिक्षु ने सहजता से पूछा, 'भाई! तुम्हारा मुंह देखने वाले कहां जाते हैं?' उसने गर्व से कहा, 'मेरा मुंह देखने वाले स्वर्ग जाते हैं।' आचार्य भिक्षु ने मुस्कुराकर कहा, 'जैन परंपरा के अनुसार किसी का मुंह देखने से स्वर्ग या नरक नहीं मिलता, लेकिन तुम्हारे कथनानुसार हमने तो तुम्हारा ही मुंह देखा है, अतः हम तो स्वर्ग या मोक्ष जाएंगे! तुम अपनी जानो।' यह सटीक उत्तर सुनकर सामने वाला शर्मिंदा हो गया।
आचार
आचार्य भिक्षु के व्यक्तित्व का मुख्य घटक उनका कठोर आचार पक्ष था। वे जीवन में आचरण की शुद्धता को सर्वाधिक महत्व देते थे। एक बार एक भाई ने उनसे पूछा, 'भीखणजी! यदि कोई साधु जंगल में रास्ता भटक जाए और पीछे से आती हुई बैलगाड़ी में बैठकर अपनी मंजिल तय कर ले, तो क्या दोष है?' भिक्षु स्वामी ने मर्मस्पर्शी उत्तर दिया, 'वह तो गाड़ी आ रही है; यदि उस मार्ग में गधा आता हो और वह उसकी सवारी कर ले, तो क्या दोष है? साधुत्व के आचार पक्ष को छोड़कर यदि कोई सवारी करता है, तो हमें क्या आपत्ति है?' यह अकाट्य तर्क सुनकर वह भाई निरुत्तर हो गया।
पारस्परिक सौहार्द
संघीय जीवन के विकास का महत्वपूर्ण सूत्र पारस्परिक सौहार्द है। जिस संघ में साधु-साध्वियां आपस में सौहार्द और प्रेम नहीं रखते, वह कभी प्रगति के शिखर को नहीं छू सकता। जहां बड़ा संघ होता है, वहां वैचारिक टकराहट की संभावना रहती है, लेकिन आचार्य श्री अपनी मेधा से उसका तत्काल समाधान कर देते थे। एक बार दो साधुओं के बीच विवाद छिड़ गया। दोनों आचार्य भिक्षु के पास आए। एक ने कहा, 'गुरुदेव! यह रसलोलुप है।' दूसरा बोला, 'मैं नहीं, बल्कि यह अधिक रसलोलुप है।' स्वामीजी ने समस्या का अनूठा समाधान निकाला। उन्होंने कहा, 'मेरी स्वीकृति लिए बिना तुम दोनों विगय खाने का त्याग करो। जो मुझसे पहले स्वीकृति मांगेगा, वह कच्चा साबित होगा और दूसरा पक्का।' दोनों ने आज्ञा शिरोधार्य की और चार महीने तक दूध, दही, घी, तेल, मिठाई, चीनी आदि का त्याग कर दिया। पूरा वर्षाकाल बीतने के बाद एक साधु का मन डोल गया। उसने गुरुदेव से आकर घी खाने की स्वीकृति मांगी। इस तरह बिना किसी विवाद और जांच के समस्या का सहज समाधान हो गया।
गुणग्राही
आचार्य श्री की दृष्टि सदैव गुणग्राही थी; वे बुराई में से भी अच्छाई खोज लेते थे। एक बार एक व्यक्ति ने उनसे आकर कहा, 'भीखणजी! लोग आपके बहुत अवगुण निकालते हैं।' स्वामीजी ने सहज भाव से कहा, 'निकाल ही तो रहे हैं, हमारे भीतर डाल तो नहीं रहे हैं। फिर इसमें अफसोस कैसा? यह तो अच्छा ही हो रहा है—कुछ अवगुण मैं स्वयं निकालने का प्रयास कर रहा हूँ और कुछ वे निकाल रहे हैं।' स्वामीजी ने मंद मुस्कान के साथ कहा कि वे तो एक प्रकार से मेरा सहयोग ही कर रहे हैं, क्योंकि अवगुणों को निकाले बिना मुक्ति संभव नहीं है। यह सुनकर सामने वाला अवाक् रह गया।
दीक्षा
दीक्षा केवल वेश बदलना नहीं, बल्कि भोग से योग की ओर प्रस्थान करना है। आचार्य भिक्षु मनुष्यों के सच्चे पारखी थे और पूरी जांच-परख के बाद ही दीक्षा देते थे। एक बार खैरवा के चतरोजी शाह दीक्षा की अनुमति मांगने आए। स्वामीजी ने उनसे कहा, 'दीक्षा की बात करना सरल है, परंतु उसकी अनुपालना करना खांडे (तलवार) की धार पर चलने के समान है। तुम दीक्षा की बात तो करते हो, किन्तु परिवार के लोगों को मोहवश रोते देखकर क्या तुम्हारी आंखों में आंसू नहीं आएंगे?' चतरोजी ने कहा, 'महाराज! आंसू तो मेरे भी आ सकते हैं।' स्वामीजी ने मर्म समझाते हुए कहा, 'भले मनुष्य! बेटी ससुराल जाती है तो उसका रोना स्वाभाविक है, लेकिन यदि जमाई भी रोने लग जाए तो कैसा लगेगा? ठीक वैसे ही, परिवार के लोग मोहवश रोते हैं, लेकिन यदि दीक्षार्थी स्वयं उन्हें देखकर रोने लग जाए, तो ऐसी स्थिति में दीक्षा संभव नहीं है।'
संघ
आचार्य भिक्षु की दृष्टि मूलग्राही थी। उन्होंने संघ का निर्माण आचार-विचार के विशुद्ध पालन के लिए ही किया था। उनके शब्द थे— 'चारित्र चोखो पलावण तांई ए मर्यादा बांधी छै।' जब उनसे पूछा गया कि आपका यह संयमित मार्ग कब तक चलेगा, तो उन्होंने कहा, 'जब तक साधु-साध्वी शुद्ध आचार-विचार का पालन करते रहेंगे और नीति-रीति के प्रति सावधान रहेंगे, तब तक यह धर्म शासन चलता रहेगा।' ये संस्मरण इस बात के जीवंत साक्षी हैं कि आचार्य भिक्षु का महान व्यक्तित्व कितनी अनगिनत दिशाओं को छूता था।