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रहस्यमयी जीवन शैली
आचार्य भिक्षु का जीवन अनेक समवायो का पर्याय रहा है। वे बचपन से ही स्वाभिमानी व्यक्ति थे। किसी के द्वारा किया गया अपमान उन्हें सह्य नहीं था—चाहे वह चाचा के द्वारा किया गया मज़ाक हो, ससुराल में गालियों की बौछार हो, या अन्य किसी के द्वारा की गई भविष्यवाणी हो।
उन्होंने अपनी प्रत्युत्पन्नमति से गलत कुरीतियों और प्रवृत्तियों को कभी पोषण नहीं दिया। बढ़ती हुई अंधरूढ़ियों का परिष्कार करना भिक्खण जी का परम लक्ष्य था। वे सत्य के जिज्ञासु थे और उनका लक्ष्य था आत्मतत्व को प्राप्त करना। उन्होंने गुरु के मोह को छोड़कर सत्य की राह पर धर्म-क्रांति के लिए कठिन मार्ग पर कदम बढ़ा दिए। उन्हें ज्ञात था कि अनेक प्रकार की कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा, परन्तु उन्हें समभाव से सहन करना ही हमारा परम लक्ष्य होगा।
उनका चिंतन यही था— 'मर पूरा देस्यां पर आत्मारा कारज-सारस्यां।'
इसी लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए उन्होंने अपने प्रिय शिष्य भारीमाल जी से भी कह दिया था कि तुम्हारे पिता उग्र प्रकृति के हैं, वे आने वाली कठिनाइयों को सहन नहीं कर पाएंगे, तुम अपने चिंतन पर दृढ़ रहो—क्योंकि उन्हें शिष्यों की भीड़ बढ़ाने का मोह नहीं था। वे भगवान महावीर द्वारा बताए हुए मार्ग को आत्मसात करना चाहते थे। संगठन की मज़बूती के लिए शिष्य-प्रथा को खत्म कर 'एक आचार, एक विचार और एक आचार्य' होना संघ में मान्य रखा, जिससे साधक सच्ची साधना करके अपने आत्म-स्वरूप को प्राप्त कर सके।
आचार्य भिक्षु भगवान महावीर की वाणी के प्रति पूर्ण समर्पित थे। शुरुआत में उन्होंने सोचा कि जनता मिथ्यात्वी है, वह तत्व को समझना नहीं चाहती। तब उन्होंने निराश होकर सिरियारी की नदी की तप्ती रेत में एकांतर तप के साथ आतापना शुरू कर दी। कुछ समय पश्चात दो विनीत शिष्य—थिरपाल जी व फतेहचन्द जी ने निवेदन किया—'गुरुदेव, तपस्या हम करेंगे, आप जनता को प्रतिबोध (उपदेश) दें।' शिष्यों के विनम्र निवेदन को स्वीकार कर उन्होंने पुनः जनता को प्रतिबोध देना शुरू किया।
आचार्य भिक्षु को 'लौह पुरुष' भी कहा है। किसी कवि ने सत्य ही कहा है–
वृक्ष की भांति संसार में फलता है कोई-कोई,
दीपक की भांति संसार में जलता है कोई-कोई।
आदर्श की बात करने में प्रवीण हो बन्धुओं!
आदर्श के पथ पर चलता है कोई-कोई।
आचार्य भिक्षु एक आदर्श पुरुष थे। अनेक भयंकर विरोधों के बावजूद भी उन्होंने मर्यादाओं का सजगता से पालन किया। वे अपने शिष्यों को भी सदैव सजग रहने की प्रेरणा देते थे। उन्होंने अपने विनीत शिष्य भारीमाल स्वामी से कहा—'अगर मैं ईर्यासमिति में गलती करूँ, तो तुम्हें तेला करना होगा।' तब भारीमाल जी ने विनय से स्वीकार करते हुए कहा—'गुरुदेव! अगर कोई दूसरा भी गलत कहे, तो हमें तेला तो करना ही होगा, उसे निर्जरा मानकर स्वीकार कर लेना।' स्वामी जी को संघ में कोई भी नई मर्यादा लागू करनी होती, तो वे सर्वप्रथम अपने परम विनीत शिष्य भारीमाल जी पर उसका व्यावहारिक प्रयोग करते और शिष्य उसे 'तहत्त' कहकर शिरोधार्य करते।
स्वामी जी दीक्षा लेने वालों की कड़ी कसौटी करते थे। जो उस कसौटी पर खरा उतरता, उसे ही दीक्षा प्रदान करते। काफी समय तक संघ में साध्वियों की दीक्षा नहीं हुई थी। एक बार तीन बहनें दीक्षा के लिए आईं। स्वामी जी ने परीक्षा लेते हुए पूछा—'अगर दीक्षा के बाद तुम तीन में से किसी एक का देवलोक गमन हो गया, तो शेष दो को संथारा (आमरण अनशन) करना होगा, क्या तैयार हो?' तीनों बहनों ने दृढ़ता और निष्ठा से इसे स्वीकार किया। ऐसी कठोर और पवित्र थी उनकी मर्यादा।
आचार्य भिक्षु के पास श्रद्धा का अमित बल था। वे जितने तार्किक थे, उतने ही श्रद्धालु भी थे। वे भगवान महावीर और उनकी वाणी पर स्वयं का सर्वस्व न्यौछावर कर चलते थे। आज उनका वही समर्पण भाव चारों ओर गुंजायित है—'है यह तेरापंथ।'
आचार्य भिक्षु की महाप्रयाण त्रिशताब्दी के पावन उपलक्ष्य में हम आपकी मर्यादाओं को शत-शत नमन करते हैं। आपके बताए गए मार्ग पर चलते हुए, वर्तमान अनुशास्ता आचार्य श्री महाश्रमण जी की पावन सन्निधि में हमारा यह धर्मसंघ संयम के पथ पर गति और प्रगति करता रहे।