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विलक्षण प्रतिभा के धनी आचार्य भिक्षु
जैन दर्शन आत्म-अस्तित्व की स्वीकृति का दर्शन है। आत्मा है, कर्म है, पूर्वजन्म और पुनर्जन्म भी है; जहाँ कोडहं' (दोष) से 'सोडहं' (शुद्धि/समाधान) तक की यात्रा चलती रहती है। आचारांग सूत्र में यह बात स्पष्ट दिखाई देती है। भगवान महावीर ने प्रतिपादन किया है कि पूर्वजन्म और पुनर्जन्म का संज्ञान किया जा सकता है। इस शक्यता में तीन हेतुओं का निर्देश किया गया है–
1. स्वस्मृति
2. पर-व्याख्या
3. दूसरे से सुनना।
इसी आप्तवाली के आधार पर आचार्य भिक्षु की जीवन-गाथा को भी समझा जा सकता है।
आत्म-समर्पण के अनूठे साधक और इसी आधार पर आगम-राशि का पारायण करने वाले भीखण जी स्थानकवासी संप्रदाय में दीक्षित हुए। उन्होंने गहन अध्ययन किया, लेकिन राजनगर के श्रावकों ने साध्वाचार के विरुद्ध एक हलचल पैदा कर दी। संत भीखन के भीतर एक कंपन शुरू हो गया। रात्रि के मंद ज्वर ने जीवन में एक नया अध्याय और जोड़ दिया कि सिद्धांतों के साथ कोई समझौता नहीं हो सकता। संकल्प की जगी चेतना ने गुरु के अपनत्व की त्याग कर दिया—'मेरे आदि, मध्य और अंत का केंद्र बिंदु आत्मा ही बनी रहेगी।' यहीं से उस दिव्य पुरुष की आत्म-विशुद्धि की यात्रा का शुभारंभ हुआ। उनकी क्रांति में दम था। संघर्षों को उन्होंने विवेकपूर्वक झेला; वे सहिष्णुता के धनी थे। उनमें बुद्धि की प्रखरता व अनुभव की निपुणता थी। अवरोध व विरोधी वातावरण में वे 'मर पूरा देस्या आत्मा रा कारज सारस्या' के लिए कृत-संकल्पित हो गए। उन्होंने भारमलजी स्वामी को संबोधित करते हुए कहा, 'आने वाला समय कठिनाइयों से भरा रहेगा। तुम क्या चाहते हो? तुम्हारी इच्छा और निर्णय अटल है।' आगे बढ़ना तुम्हें मंजूर था, रुकना कहाँ मंजूर था; चलते रहे आँधी-तूफानों में, गजब का वह आत्मबल था।
अनेकांत के आलोक में आचार्य भिक्षु
भगवान महावीर का अनेकांतवाद व आइंस्टीन का सापेक्षवाद उनकी जीवनशैली में प्रतिध्वनित था। उनके विचारों में मुखरित थी। उन्होंने संघ में अनेकांत को व्यापक रूप दिया। मर्यादाओं का निर्माण और क्या है? आचार्य भिक्षु ने शुद्ध आचार व शुद्ध विचार के विकास के अपना लक्ष्य बनाया। दूसरों की निंदा के क्षेत्र नहीं गए । उन्होंने अपनी शक्ति का संचय किया और एक संवैधानिक आदर्श स्थापित किया। उनका दृष्टिकोण विधेयात्मक (सकारात्मक) था। उन्होंने विचारों में सामंजस्य का साम्राज्य स्थापित किया। अनाग्रही सोच का विस्तार व सह-अस्तित्व की चेतना का जागरण करने वाले वे एक आध्यात्मिक पुरुष थे। वे दूसरों को मुक्त करना चाहते थे, इसलिए उन्होंने मुक्तता की स्वतंत्रता दी और विवेक को जगाया। विचारों की स्वतंत्रता तो दी, किंतु मुक्त गगन में विचरते मन को भी मर्यादा की डोर से बाँधकर रखा। इससे संघ शक्ति-संपन्न बना और एक नेतृत्व की शालीन परंपरा का सूत्रपात हुआ।
फ्रांस में जन्मे हेनरी फेयोल (Henri Fayol) के प्रशासनिक प्रबंधन के सिद्धांतों से आचार्य भिक्षु द्वारा निर्मित संविधान काफी मिलता-जुलता है–
Unity of Command - आदेश की एकता
Unity of Direction - दिशा की एकता
आचार्य भिक्षु ने लिखा है–
'सर्व साध्वियाँ एक आचार्य की आज्ञा में रहें।'
'विहार और चातुर्मास आचार्य की आज्ञा से करें।'
उन्होंने अपने आसपास योग्यता के परिवेश को तैयार किया। योग्य शिष्य ही बलिदान कर सकता है; विनम्रता, सहिष्णुता और समर्पण उसी से शोभित हो सकते हैं।
उग्र प्रकृति के धनी मुनि नाथोजी आवेश के कारण संघ से चले गए। संत जन ने स्वामीजी से निवेदन किया, तो आचार्य भिक्षु ने कहा—'हाथ पर बड़ा फोड़ा हो गया हो और वह बड़ा कष्ट दे रहा हो, अगर वह फूट जाए तो क्या होगा? आराम होगा या कष्ट?' संतों ने कहा—'शांति मिलेगी।' आचार्य भिक्षु ने कहा—'नाथोजी का चले जाना कोई दुःख की बात नहीं है, उनका जाना संघ के स्वास्थ्य के लिए अच्छा है।'
श्रम-सौंदर्य से भरा अलौकिक व्यक्तित्व
शासन माता साध्वीप्रमुखा श्री कनकप्रभाजी ने अपनी कविता में लिखा है–
जो अंधेरे में उजाला बो चुका है,
आज उसकी याद में कुछ गीत गाएँ।
जो बनाकर सुधा विष को पी चुका है,
उस फरिश्ते की कहानी हम सुनाएँ॥
जो पुजारी अनवरत प्रभु-देवता का,
उस सृजन की सफलता को सिर नवाएँ॥
आचार्य भिक्षु ने सक्रियता का जीवन जिया, उन्हें कभी विश्राम की आवश्यकता अनुभूत नहीं हुई। अपना कार्य स्वयं अपने हाथों से करने की वृत्ति उनमें प्रारंभ से ही थी। विहार करना, व्याख्यान देना और गोचरी जाना—यह उनका नित्य क्रम बना हुआ था। वे रात-रात भर जागकर तत्त्व-चर्चा करते थे। एक बार दो आगंतुक तत्त्व-चर्चा करने आए; पूरी रात्रि व्यतीत हो गई। जब उन्होंने तत्त्व को परिपूर्णता के साथ समझा, तो गुरु-धारणा स्वीकार कर ली। तभी प्रतिक्रमण की वेला हुई। स्वामीजी ने कहा—'संतों उठो, प्रतिक्रमण का समय होने वाला है।'
साधु उठकर पूछने लगे
आप कब सोए?' स्वामीजी ने कहा—'पहले यह तो पूछो कि आप कब सोए?' एक बार किसी ने स्वामीजी से कहा—'इस वृद्धावस्था में भी आप खड़े-खड़े प्रतिक्रमण क्यों करते हैं? आने वाले संत तो बैठकर अवश्य करेंगे।' तब सत्तर वर्ष की उम्र में भी वे लगभग अपना नांगला ओर 'झोलका' (पात्र आदि रखने का झोला) स्वयं रखते थे और दस किलो वजन अपने कंधों पर स्वयं उठाते थे। आचार्य भिक्षु के वैशिष्ट्यमय जीवन के पृष्ठों को जब-जब पढ़ते हैं या सुनते हैं, तब मन रोमांच से भर जाता है। वे विलक्षण प्रतिभा के धनी थे।
ज्योतिपुंज आचार्य श्री महाश्रमणजी की सन्निधि में आचार्य भिक्षु जन्म-त्रिशताब्दी का भव्य आयोजन दूर-संचार के माध्यम से देखकर मैं मंत्रमुग्ध हो गया। और जब साधु-साध्वीवृंद के मुख से प्रवचन-माला सुनी, तब लगा कि इस अनुसंधान के द्वारा उनके जीवन के अनेक अनछुए पृष्ठों पर प्रकाश डाला जा सकता है। ऐसे दिव्य पुरुष के चरणों में शत-शत नमन।