3 बातें ज्ञान की

स्वाध्याय

– आचार्यश्री महाश्रमण

3 बातें ज्ञान की

उत्तम पुरुष और उनके प्रकार
उत्तम पुरुष का दूसरा प्रकार है— भोगपुरुष। भोग के क्षेत्र में उत्तम होते हैं चक्रवर्ती। संसार में सबसे अधिक शक्तिसंपन्न और सत्ताधारी यदि कोई व्यक्ति है तो वह है छह खंडों का अधिपति चक्रवर्ती। जहाँ आध्यात्मिक दृष्टि से तीर्थंकर को श्रेष्ठ बताया गया, वहीं भौतिकता की दृष्टि से चक्रवर्ती को श्रेष्ठ माना गया।
दुनिया में तिरेसठ व्यक्ति उच्च कोटि के होते हैं— चौबीस तीर्थंकर, बारह चक्रवर्ती, नौ वासुदेव, नौ बलदेव और नौ प्रतिवासुदेव। ये कुल तिरेसठ पुरुष शलाकापुरुष कहलाते हैं। इन तिरेसठ विशिष्ट पुरुषों में अध्यात्म-जगत् का संचालन करने वाले भी हैं और भौतिक जगत् का संचालन करने वाले भी हैं। धर्म के क्षेत्र में चौबीस तीर्थंकर होते हैं। उनका भौतिकता से कोई लेना-देना नहीं होता। वे धर्मक्षेत्र के अधिकृत व्यक्ति होते हैं। भौतिक जगत् के अधिकृत व्यक्ति चक्रवर्ती होते हैं। भौतिक दुनिया में उनसे बड़ा कोई नहीं होता। इसलिए उनको भोगपुरुष कहा गया है।
उत्तम पुरुष का तीसरा प्रकार है—कर्मपुरुष। कर्म के क्षेत्र में उत्तम होते हैं वासुदेव। तीन खंडों का अधिपति वासुदेव सत्ताधारी होने के बावजूद मरकर नियमतः नरक में ही जाता है। एक ओर हाथ में सत्ता है तो दूसरी ओर वह पाप कर्मों का बंधन करने वाला भी होता है। सत्ता और पाप कर्म का योग होने से परिणामतः उसे नरक में जाना पड़ता है। चक्रवर्ती अपने पद से मुक्त होकर तीर्थंकर भी बन सकता है। इसलिए जो चक्रवर्ती होता है, उसके लिए नरक में जाना जरूरी नहीं होता, परन्तु वासुदेव की गति नरक ही होती है। कहा भी जाता है—'राजेश्वरी नरकेश्वरी' अर्थात् जो वासुदेव जैसा सम्राट बनेगा, उसे नरकेश्वर बनना ही पड़ेगा, नरक में जाना ही पड़ेगा। तीर्थंकर मृत्यु के बाद निश्चित ही मोक्ष जाते हैं। चक्रवर्ती की यदि चक्रवर्ती पद पर रहते हुए मृत्यु हो जाए तो उसकी गति नरक होती है और यदि वह चक्रवर्तित्व का त्याग कर संयम ग्रहण करे तो उसकी गति स्वर्ग अथवा मोक्ष होती है। जैसे सोलहवें तीर्थंकर भगवान शांतिनाथ, सत्रहवें तीर्थंकर भगवान कुंथुनाथ और अठारहवें तीर्थंकर भगवान अरनाथ पहले चक्रवर्ती बने, फिर उसी जन्म में तीर्थंकर भी बन गए।
दुनिया का यह सौभाग्य है कि हमेशा कोई न कोई तीर्थंकर कहीं न कहीं अवश्य रहते हैं। दुनिया तीर्थंकर से कभी खाली नहीं रहती। महाविदेह क्षेत्र पांच होते हैं, भरत क्षेत्र पांच होते हैं और ऐरावत क्षेत्र भी पांच होते हैं। ये पन्द्रह कर्मभूमियां कहलाती हैं। भरत क्षेत्र और ऐरावत क्षेत्र में काल के पहले आरे से लेकर छठे आरे तक की व्यवस्था है। महाविदेह में ऐसी व्यवस्था नहीं होती। पांच महाविदेहों में जब एक साथ एक सौ साठ तीर्थंकर होते हैं और उसी समय पांच भरत क्षेत्र और पांच ऐरावत क्षेत्र में भी पांच-पांच तीर्थंकर हों तो एक साथ कुल एक सौ सत्तर तीर्थंकर हो जाते हैं। प्रत्येक भरत क्षेत्र और प्रत्येक ऐरावत क्षेत्र में एक साथ एक से ज्यादा तीर्थंकर नहीं हो सकते। कई बार भरत क्षेत्र और ऐरावत क्षेत्र तीर्थंकर के बिना भी रह जाते हैं। जैसे वर्तमान में भरत क्षेत्र और ऐरावत क्षेत्र में कोई तीर्थंकर विद्यमान नहीं हैं, परन्तु महाविदेह क्षेत्र में अभी भी सीमंधर स्वामी आदि बीस तीर्थंकर विचरण कर रहे हैं। महाविदेह क्षेत्र ही ऐसा क्षेत्र है जो तीर्थंकर से पूर्णतया खाली कभी नहीं रहता। इस प्रकार अनंतकाल बीत गया, आगे भी अनंतकाल है। दुनिया में कम से कम बीस और अधिक से अधिक एक साथ एक सौ सत्तर तीर्थंकर विद्यमान रह सकते हैं। दुनिया में धर्म की दृष्टि से पूर्ण अंधकार कभी नहीं होता। हमेशा कहीं न कहीं, कोई न कोई महासूर्य अवश्य चमक रहा होता है।
जीवन में उत्तमता का महत्त्व होता है। व्यक्ति धार्मिक दृष्टि से उत्तमता की ओर आगे बढ़ने का प्रयास करे। साधना के क्षेत्र में, ज्ञान के क्षेत्र में, सेवा आदि के क्षेत्र में आगे बढ़ने का प्रयास करे। चाहे दो कदम ही आगे बढ़े, किन्तु आगे बढ़ने का लक्ष्य होना चाहिए। एक चींटी भी चलते-चलते सैकड़ों योजन तक पहुंच सकती है और यदि गति न हो तो तीव्र गति वाला गरुड़ भी वहीं का वहीं रह जाता है। आदमी को पुरुषार्थ करना चाहिए और यह सोचना चाहिए कि जिस क्षेत्र में काम करूं, उस क्षेत्र में आगे बढ़ूं, उसमें कौशल प्राप्त करूं। यदि कोई वक्ता है तो यह सोचे कि वक्तृत्व में और कैसे निखार ला सकता हूं। यदि कोई लेखक है तो यह सोचे कि लेखन में और विकास कैसे कर सकता हूं। व्यक्ति को दक्षता, चातुर्य और निपुणता को पाने का प्रयास करना चाहिए। प्रयास करने से कुछ न कुछ अवश्य प्राप्त हो सकता है।
तीन पदों से उऋण होना दुःशक्य
ठाणं में बताया गया है— तिण्हं दुप्पडियारं समणाउसो! तं जहा—अम्मापिउणो, भट्टिस्स, धम्मायरियस्स। (3/87)
आयुष्मान् श्रमणों! तीन पद दुष्प्रतिकार हैं। उनसे उऋण होना दुःशक्य है—
1. माता-पिता 2. भर्ता (पालन-पोषण करने वाला) 3. धर्माचार्य।