संबोधि

स्वाध्याय

– आचार्यश्री महाप्रज्ञ

संबोधि

ध्यान के तीन प्रकार और हैं—कायिक ध्यान, वाचिक ध्यान और मानसिक ध्यान।
कायिक ध्यान
शरीर का प्रकंपन पूर्णतः कभी नहीं रुकता। उसकी ऊर्मियों का प्रवाह निरंतर चलता रहता है। जब हम स्थिर होकर बैठते हैं तब भी चलता रहता है। फिर शरीर का अप्रकंपन कैसे हो सकता है? यहां अप्रकंपन का प्रयोग सापेक्ष है। यद्यपि शरीर के प्रकंपन पूर्णतः नहीं रुकते, फिर भी हाथ, पैर आदि अवयवों की चेष्टाएं नहीं होतीं, शरीर बाह्याकार में स्थिर हो जाता है तब अप्रकंपन का एक बिंदु बनता है। यही कायिक ध्यान है। यह अप्रकंपन का सामान्य बिंदु है। इसमें मात्रा-भेद होता है। एक व्यक्ति प्रथम अभ्यास में अपने शरीर के प्रकंपनों को रोकता है, वह सामान्य स्थिरता होती है। अभ्यास करते-करते वह अप्रकंपन की सुदृढ़ स्थिति तक पहुंच जाता है। मात्रा-भेद के आधार पर कायिक ध्यान की अनेक श्रेणियां बन जाती हैं।
आनापान ध्यान
श्वास का प्रकंपन भी पूर्णतः नहीं रुकता। अंतर् में प्राण का प्रवाह चालू रहता है। हमारे शरीर के रोमकूप सूक्ष्म आनापान को ग्रहण करते रहते हैं। उसे मंद किया जा सकता है, रोका जा सकता है। आनापान ध्यान का प्रथम बिंदु श्वास को मंद करने का अभ्यास है। स्वस्थ मनुष्य का श्वास जिस गति से चलता है उसमें मंदता लाना, उसके प्रकंपनों को कम करना, इस दिशा में पहला प्रयत्न है। इस प्रयत्न में दो बातें मुख्य हैं—
(१) श्वास की संख्या को कम करना।
(२) प्राणवायु की मात्रा को कम करना।
मृदु-मंदता में श्वास दीर्घ हो जाता है। मध्य-मंदता में प्राणवायु की मात्रा कम हो जाती है। अतिमंदता में महाप्राण की स्थिति घटित होने लग जाती है। श्वास-निरोध या कुंभक सहज ही हो जाता है।
वाचिक ध्यान
जैसे शरीर और श्वास की ऊर्मियां निरंतर प्रवाहित रहती हैं, वैसे वाणी की ऊर्मियों का प्रवाह निरंतर नहीं रहता। हम जब बोलने का प्रयत्न करते हैं तभी उसका प्रवाह होता है। बोलने की आकांक्षा और उसका प्रयत्न नहीं करना ही उन प्रकंपनों को रोकना है। यही वाचिक ध्यान है।
मानसिक ध्यान
मन के तीन मुख्य कार्य हैं—स्मृति, मनन और कल्पना। अतीत की स्मृति, वर्तमान का मनन और भविष्य की कल्पना होती है। हम जो मनन और चिंतन करते हैं उसकी आकृतियां बनती हैं। ये आकृतियां मनन समाप्त होने पर आकाश-मंडल में फैल जाती हैं। वे हमारे मस्तिष्क के भीतर भी अपना प्रतिबिम्ब छोड़ जाती हैं, जिसे हम धारणा, वासना या अविच्युति कहते हैं। यह धारणा हमारे कोष्ठों में संचित रहती है। जब कभी कोई निमित्त मिलता है तो हमारे स्मृति कोष्ठ जाग्रत हो जाते हैं, मन गतिशील हो जाता है।
जब हम मनन करना चाहते हैं तब मानसिक ऊर्मियों का प्रवाह चालू हो जाता है। जितने समय तक हमारा मन चलता है, उतने समय तक यह प्रवाह भी चालू रहता है। हम स्मृति और मनन के आधार पर कल्पना करते हैं। उस समय भी मन की ऊर्मियां प्रवाहित हो जाती हैं।
स्मृति को रोककर मानसिक ऊर्मियों को किसी एक विषय में प्रवाहित कर देना मानसिक ध्यान है। इस ध्यान में मानसिक प्रकंपन समाप्त नहीं होते, किंतु उनकी गति एक दिशा में हो जाती है और जब तक वह गति एक दिशा में रहती है तब तक मानसिक ध्यान बना रहता है। जैसे ही मानसिक ऊर्मियों का प्रवाह अनेक दिशाओं में गतिशील होता है, ध्यान भंग हो जाता है।