जैन शासन : अतिशय आत्मानुभूति के क्षण

रचनाएं

शासनश्री साध्वी कंचनप्रभा

जैन शासन : अतिशय आत्मानुभूति के क्षण

जैन शासन की पावन परम्परा में जब कभी समय के कालचक्र ने अपना प्रभाव दिखाया, तब-तब कोई महामना अवश्य क्रान्तद्रष्टा बन कर आए, जो महावीर वाणी पर स्वयं गतिमान् हुए तथा जनता को भी चारित्रिक जागृति का संदेश दिया। इस प्रकार के चारित्रिक उन्नयन का साक्षात् साक्षी है तेरापंथ धर्म संघ। आचार्य भिक्षु इस धर्म संघ के प्रवर्तक हुए। वे सिंह स्वप्निष माता दीपा बाई के गर्भ में आए। उनको तथा पारिवारिक जनों को स्वप्न-फल विशेषज्ञों ने कहा— 'दीपा बाई! तुम ऐसे पुत्र को जन्म देनेवाली हो जो सिंह की तरह गूंजेगा। चक्रवर्ती जैसे महापुरुषों की माताएं ऐसे स्वप्न देखा करती हैं।' आचार्य भिक्षु सचमुच रहस्यमय पुरुष थे। उन्होंने विवाह किया, एक पुत्री का जन्म हुआ।
सौभाग्य यह रहा कि उन्होंने तीस वर्ष की वय (आयु) में स्थानकवासी सम्प्रदाय के वरिष्ठ आचार्य रूघनाथजी महाराज के पास दीक्षा ली। उनकी अनुशासित जीवन शैली, स्वाध्याय-प्रवण प्रतिभा आदि देखकर लोग सोचते थे कि यह भीखण (आचार्य भिक्षु) रूघनाथजी महाराज का उत्तराधिकारी बनेगा, परन्तु भवितव्यता कुछ और थी। आचार्य भिक्षु ने गहराई से तत्त्व को समझा तथा वर्तमान वातावरण को भी जाना। प्रत्येक साधु सम्प्रदाय में चेला-चेली की भूख लगी है, वहाँ वैराग्य की कसौटी नहीं है। रुपये देकर चेला-चेली खरीदे जा रहे हैं। एकेन्द्रिय की हिंसा हो रही है, पर अगर पंचेन्द्रिय का पोषण है तो वहाँ पुण्य बन्ध का निरूपण किया जा रहा है।
आचार्य भिक्षु ने कहा— 'हिंसा में अगर पंचेन्द्रिय का पोषण हो रहा है, तो वहाँ पुण्य का बन्ध नहीं पाप का ही बंध है?'
उस समय प्रचारित किया जा रहा था कि भगवान् महावीर ने केवलज्ञान से पूर्व तेजोलेश्या लब्धि फोड़ कर गोशालक को बचाया, पर आचार्य भिक्षु ने कहा–
''छह लेश्या हूंति जद वीर में, हूंता आंठु ही करम।
छद्मस्थ चूक्या तिण समे, कोई मूरख थापै धरम॥'
अर्थात् लेश्या फोड़ना चारित्र का प्रमाद है। केवलज्ञान प्राप्ति के बाद जब सर्वानुभूति व सुनक्षत्र मुनियों पर जब गोशालक ने तेजोलब्धि फोड़ कर उनका प्राणान्त किया, तब तो भगवान महावीर ने शीतल तेजोलब्धि नहीं फोड़ी। तथ्य या निष्कर्ष यह है कि मुनि कभी लब्धि नहीं फोड़ सकता। इसी प्रकार धन से जो खरीदा जा सके, वह धर्म नहीं है। वह तो आत्म-आराधना का महान् दर्शन है।
विरोधियों की भाषा में लोग कह रहे थे कि तेरापंथी लोग दान-दया का निषेध बता रहे हैं, पर आचार्य भिक्षु के मन में कोई घबराहट नहीं थी। उन्होंने दृढ़ता के साथ कहा कि जहाँ हिंसा है वहाँ निर्जरा नहीं, और निर्जरा के बिना पुण्य नहीं। आचार्य भिक्षु ने कहा— 'जो तत्त्व समझ में न आए, वह बहुश्रुत (ज्ञानी) व्यक्तियों से समझो। यदि फिर भी समझ में न आए तो केवलीगम्य कर दो, पर गण में भ्रान्ति मत फैलाओ।'
वर्तमान में आचार्य भिक्षु के यशस्वी पट्टधर, युगप्रधान, परम वंदनीय आचार्य श्री महाश्रमणजी की पावन सन्निधि तेरापंथ धर्म संघ का गौरव है। आचार्य भिक्षु का एक वह भी समय था जब उन्होंने विरोधों, संघर्षों व समता से झेलते हुए एकाकी होकर कहा था— 'मर पूरा देस्या, आत्मा रा कारज सारस्या।'
आज उनके पदचिह्नों पर वर्तमान में लगभग ८०० साधु-साध्वी तथा लाखों की संख्या में श्रावक-श्राविकाएं एक गुरु के अनुशासन में सम्यक् ज्ञान, सम्यक् दर्शन और सम्यक् चारित्र की आराधना के साथ आनंदानंदभूति कर रहे हैं। इतना ही नहीं, बल्कि समणी वृन्द के सहयोग से विदेशों की धरा पर भी प्रवासी श्रावक-श्राविकाएं इससे लाभान्वित हो रहे हैं।