मरुधर माटी बलिदानी भिक्षु की अमर कहानी

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साध्वी सुरेखा

मरुधर माटी बलिदानी भिक्षु की अमर कहानी

मरुधर माटी बलिदानी भिक्षु की अमर कहानी,
'कंटालियो' आज बण्यो गुलजार है
हो श्रद्धा-भक्ति रो जहाँ खिल्यो मंदार है (आँ)
मां दीपा के आंगन में कोई मानों कल्पतरु उतरा मानों... अवतारी भिक्षु आये मन आंगन हो गया हराभरा आंगन ...
तीर्थ स्थल बन गई माटी, मुस्कानों की वह घाटी
अम्बर से बरस रही रसधार है। हो श्रद्धा...
योग सिद्धियां लेकर कोई योगी पुरुष भू पर आया योगपुरुष...
जनम जनम का संचित वैभव साथ, स्वयं के है लाया साथ... कांटो में फूल खिला जो, मरुधर को रत्न मिला वो
धरती की पूर्ण हुई मनुहार है।। हो श्रद्धा...
सिंह स्वपन माता ने देखा सहज बना वह फलदायी सहज...
भिक्षु वाणी देश विदेशां पहुंची संघ री पुण्याई पहुंची...
मीठी इक्षु सी धारा, युग को है मिला किनारा
नत मस्तक सारा यह संसार है।। हो श्रद्धा...
भिक्षु त्रि जन्म सदी उपहार है।
लय : प्रज्ञा के दीप जलेंगे