रचनाएं
तप की धुनी रमाते बीती
चिर विराग की ओढ़ी निर्मल, ज्यों की त्यों धर दीन्ही चदरियां।
तप की धुनी रमाते बीती, आर्य भिक्षुकी पूरी उमरियां।
सिद्ध पुरुष की पूरी उमरियां॥
ओढर दानी बन कर आये जीवन भर बांटा ही बांटा।
कुदरत को पहचान चले तुम फूलों में होता है कांटा।
जीवन जोत उजर गयी बाती परम ज्ञान की खुली गठरियां॥
सत्साहस के महावज्र से संघर्षो के पर्वत तोड़ें|
संशय में भटके कदमों को आस्था की मंजिल से जोड़ें|
गूंज उठी भू नभ में तेरी, स्वयं प्रकाशी गीत लहरियां ॥
निपट अकेले महासंत के पीछे आज जुड़ा है मेंला।
बीत गई पतझड़ की मौसम आई है बासंती बेला|
मलयज सी शीतल छाया है ढ़ली धाम की दुःसह दुपहरियां॥
जब भी तुम्हें बदलना चाहा युग के आक्रामक तेवर ने।
बदल दिया पर जग को तेरे अप्रतिहत पौरुष के स्वर ने।
सत्य सूर्य से हटी स्वयं ही असत् तिमिर की श्याम बदरियां॥
क्षीण हुई जब सत् शिवधारा, तब तुमने अवतार लिय।
'अंधेरी ओरी' में तुमने, दीप अलौकिक जला दिया।
त्रिशताब्दी क्या सहस्त्राब्दी तक सदा बहेगा यह गण दरिया॥