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आचार्य भिक्षु : कर्तृत्व एवं व्यक्तित्व
आचार्य भिक्षु का कर्तृत्व एवं व्यक्तित्व निराला था। भगवान महावीर के विशुद्ध दर्शन एवं शुद्ध साधुत्व का पालन करना ही उनके जीवन का एकमात्र लक्ष्य था। उन्होंने आगमों का गहरा अध्ययन किया और आगम-वाणी को हृदयंगम किया। आगम का एक प्रसिद्ध सूक्त है— 'सच्चम्मि छिर कुव्वहं' अर्थात् अपनी बुद्धि को सत्य में लगाओ। वे सत्य के प्रति पूर्णतः समर्पित थे। उन्होंने संकल्प लिया था कि राह में कितनी ही कठिनाइयाँ आएँ, वे उन्हें समता भाव से झेलेंगे।
आगम के गहन अध्ययन से उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि जिस श्रद्धा की ऊँचाई से पूर्व में निष्क्रमण किया गया था, वर्तमान में उसमें कुछ कमी नज़र आ रही है। अतः अब मुझे शुद्ध आचार-विचार का पालन करना ही होगा। वे कुछ वर्षों तक स्थानकवासी संप्रदाय में रहे, तत्पश्चात् आत्म-साधना हेतु सत्य मार्ग पर अग्रसर होने के लिए वे वहाँ से पृथक हो गए।
उन्होंने बगड़ी में रात्रि प्रवास 'जेतसिंहजी की छतरी' (विश्राम स्थल/शमशान) में किया। जो स्थान सामान्यतः मनुष्य का अंतिम पड़ाव होता है, वह स्वामीजी की एक नई और महान यात्रा का प्रथम प्रस्थान-बिंदु बन गया। वह रामनवमी का पावन दिन था, जो स्वामीजी के लिए आत्मविजय के पथ पर अभिनिष्क्रमण का एक पुनीत अवसर सिद्ध हुआ।
केलवा का ऐतिहासिक प्रसंग और 'तेरापंथ' का उदय
पूर्ण रात्रि ध्यान और आत्म-चिंतन में लीन
रहने के बाद, अगले दिन विहार करके वे केलवा पहुँचे। वहाँ उनका भारी विरोध हुआ; उन्हें न तो ठहरने के लिए स्थान मिला और न ही गोचरी (आहार-पानी)। विरोधी तत्वों का सोचना था कि भीखण (आचार्य भिक्षु का पूर्व नाम) को कोई स्थान न दिया जाए, और जो भी उनकी सहायता करेगा, उसका संघ से सामाजिक बहिष्कार कर दिया जाएगा।
इसके बाद विरोधियों ने कुटिलतापूर्वक विचार किया कि इन्हें कोई ऐसा स्थान दिया जाए जहाँ 'साँप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे'। उन्होंने स्वामीजी को एक ऐसी अंधेरी कोठरी (ओरी) देने का निर्णय किया, जिसमें यक्षदेव का भयंकर प्रकोप माना जाता था और जहाँ जाने वाला कोई भी व्यक्ति जीवित नहीं बचता था।
परंतु, स्वामीजी इस संकट से तनिक भी विचलित नहीं हुए। स्वामीजी की कठोर साधना, त्याग और अद्भुत तपोबल को देखकर वह यक्षदेव भी उनके चरणों में नतमस्तक हो गया। अंततः उस महापुरुष के तप के आगे विरोधियों का अहंकार भी चूर-चूर हो गया। वहीं पर उन्होंने पूर्व दिशा में विराजमान सीमंधर स्वामी को भावपूर्ण वंदना करते हुए ऐतिहासिक उद्घोष किया— 'हे प्रभो! यह तेरापंथ।'
आदर्श सिद्धांत एवं युगप्रवर्धक मर्यादाएँ
आचार्य भिक्षु सिद्धांतों के पक्के थे। उनमें ज्ञान, श्रद्धा और क्रिया का अनूठा समन्वय था। वे अपने लक्ष्य के प्रति सदैव दृढ़-संकल्पित रहे।
सतत जागरूकता
वे आकाश में स्वच्छंद विचरते पक्षी की तरह निर्लिप्त भाव से चलते रहे। पूर्ण जागरूकता के साथ वे ज्ञान-यज्ञ में समर्पित हो गए। उन्होंने समय के एक-एक पल को पूरी प्राणवत्ता के साथ जिया। 'खणं जाणाई पंडिए' (पंडित वही है जो समय के एक-एक क्षण को जानता है) उनके जीवन का महान मूलमंत्र था।
विवेक-शक्ति:
हिंसा और धर्म के बीच क्षीर-नीर (दूध का दूध, पानी का पानी) का विवेक दिखाने वाली प्रतिरोधात्मक शक्ति उनमें जागृत थी। वे सामाजिक और धार्मिक बुराइयों के विरुद्ध चट्टान की तरह अडिग खड़े रहे, जिसके परिणामस्वरूप बड़ी से बड़ी समस्याएँ भी समाधान पाकर स्वयं नतमस्तक हो गईं। उनमें सही समय पर सही निर्णय लेने की अद्भुत क्षमता थी। उन्होंने समाज को शुद्ध सम्यक्त्व की वास्तविक परिभाषा समझाई।
प्रबल आत्मविश्वास:
उन्हें अपने आप पर पूरा भरोसा था और उनका आत्मविश्वास अडिग था। उद्देश्य के प्रति उनकी गहरी आस्था थी और उनकी विवेक-चेतना सदा जागृत रहती थी।
अभय वृत्ति: जीवियासा मरणभय विमुक्के' — वे जीवन की आसक्ति और मरण के भय से पूरी तरह मुक्त थे।
युगद्रष्टा एवं मर्यादा-पुरुषोत्तम: उन्होंने भविष्य की नब्ज को पहचाना और संघ के सुचारू संचालन के लिए ऐतिहासिक मर्यादाओं का निर्माण किया। उन्होंने 'एक आचार, एक अनुशासन एवं एक आचार्य' का अद्वितीय सिद्धांत दिया। उन्होंने यह कठोर नियम बनाया कि कोई भी साधु या साध्वी अपना व्यक्तिगत चेला-चेली नहीं बनाएगा; जो भी दीक्षित होंगे, वे सब सामूहिक रूप से संघ के आचार्य के ही शिष्य कहलाएँगे।
इसी महान दूरदर्शिता का सुपरिणाम है कि आज तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अनुशास्ता, युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमणजी उन्हीं के पदचिह्नों पर आगे बढ़ते हुए अद्वितीय पुरुषार्थ कर रहे हैं। आज 'तेरापंथ' संपूर्ण जैन समाज में अनुशासन और शुद्धाचार का एक अनुपम उदाहरण बना हुआ है और इसने विश्व क्षितिज पर अपना नाम स्वर्णाक्षरों में रोशन किया है।