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जगत के क्षितिज पुरुष - आचार्य भिक्षु
संसार की विशालता में परिवर्तनों का दौर कालक्रम के साथ जुड़ा हुआ है। इन परिवर्तनों के क्रम में कभी प्राकृतिक, कभी सांस्कृतिक, कभी साम्प्रदायिक, कभी धार्मिक, तो कभी एकल क्रांतियों का प्रभाव मुखर रहा है। इसमें क्षेत्र और काल का योग तो है ही, पर व्यक्ति की मानसिकता और भावात्मक चेतना का जुड़ाव भी प्रमुखता से योगभूत है।
कालक्रम की गणना में अनेक युगों का प्रभाव व्यक्ति के व्यवहार के साथ जुड़ा हुआ था एवं आज भी है। ऐसे में ईसा की अठारहवीं सदी को धार्मिक क्रांति के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है, जिसमें अनेकानेक जातियों और धर्मों में सार्वभौमिक क्रांतिकारी व्यक्तित्व उभरे।
इसी समयावधि में अध्यात्म जगत में दो बड़े वैचारिक परिवर्तन हुए–
१.जहाँ रामस्नेही सम्प्रदाय के प्रणेता
स्वामी रामचरण जी ने निवृत्ति मार्ग का शंखनाद किया।
२. वहीं जैन परम्परा में सम्यक् आचार-चर्या के खोजकर्ता, अध्यात्म जगत के क्षितिज पुरुष आचार्य भिक्षु ने एक नए परिवेश को जन्म दिया।
आचार्य भिक्षु ने समाज और धर्म में व्याप्त कई विसंगतियों पर कड़ा प्रहार किया–
१.रूढ़िवादी विचारधारा का विरोध
२. धर्मगुरुओं की मठाधीशता पर चोट
३. शिष्य-प्रथा की जड़ों पर प्रहार
४.लोक-चेतना को यथार्थ सत्य से अवगत कराना
आचार्य भिक्षु ने उस काल में जो मौलिक विचार और दर्शन प्रकट किया, वह पूर्ववर्ती एवं वर्तमान युग के विचारकों तथा समकालीन चिन्तकों के लिए चिन्तन का एक सुदृढ़ आधार बन गया। आचार्य भिक्षु की अपरिमित मेधा और विलक्षण प्रतिभा, युगीन संदर्भों में सत्यों का बेबाक प्रकटीकरण है।
उन्होंने धर्म, पुण्य, दया, दान और साध्य-साधन आदि के संदर्भ में प्रवाहित पुरानी धारणाओं के विपरीत अपनी मति से नई प्रस्थापनाएँ कीं।
यह उनके मेधाबल का परिचायक था। उनकी इन प्रस्थापनाओं में अर्हत्-वाणी के रहस्यों का प्रवाह था।
आचार्य भिक्षु के अंतःकेंद्र और परिधि में केवल आत्म-शुद्धि का ही स्वर मुखर था। उनमें आत्मा की अमरता का अटल विश्वास था, इसलिए वे अभय थे। उनका चिन्तन इस सूक्ति से और अधिक प्रखर सिद्ध होता है कि— 'मर पूरा देस्यां आत्मा रा कारज सारस्यां'। ये कालजयी वचन उनकी आत्म-साधना की उच्चतम अभिव्यक्ति थे।
आचार्य भिक्षु ने आदि तत्व की मुखरता के लिए अनेक उदाहरणों से जन-जीवन को प्रतिबोधित किया। इसी प्रसंग में एक बार आचार्य भिक्षु से किसी ने पूछा— 'इतने सम्प्रदाय हैं, उनमें साधु कौन है और असाधु कौन?'
आचार्य भिक्षु ने अपनी प्रत्युत्पन्नमति से उसे एक सुंदर दृष्टांत के माध्यम से समझाया:
१.मान लो कोई व्यक्ति अचक्षु (नेत्रहीन) है। उसने किसी वैद्य से पूछा कि शहर में नंगे कितने हैं और वस्त्र पहने हुए कितने?
२.वैद्य जी ने कहा कि मैं तुम्हारी आँखों में सूरमा (दवा) डाल देता हूँ, जिससे तुम्हें दिखने लग जाएगा; फिर तुम स्वयं ही देख लेना।
३.इसी प्रकार साधु-असाधु की पहचान की दृष्टि तो हम बता देते हैं, इसका निर्णय तुम स्वयं कर लेना।
आचार्य भिक्षु त्रिकालदर्शी प्रवर थे। उन्होंने साधुता और असाधुता को अपनी कसौटी पर कसते हुए कहा था–
वैराग घट्यो ने भेख बधियो,
हाथ्यां रो भार गधालदियो।
थक गया बोज दियो रालो,
एहवा भेख धारी पंचम कालो।।
उनका यह कथन साधुत्व वेश के साथ आचार की शिथिलता एवं चितकबरेपन पर कड़ा प्रहार था। उन्होंने अर्हत्-आज्ञा को ही सर्वोपरि प्रमाण माना। यह उनकी अर्हत्-वाणी के प्रति समर्पण की चेतना का मूर्त उदाहरण है। उन्होंने कहा कि–
१. जहाँ आज्ञा है, वहाँ साधना की उत्कृष्टता है।
२. वहीं संयम की वृद्धि है।
३. इसी के साथ ज्ञान, दर्शन तथा चारित्र का संरक्षण भी प्रगाढ़ होता है।
आचार्य भिक्षु क्रांतिदृष्टा और युग-प्रणेता प्रवर थे। उनकी सहिष्णुता और दूरदर्शिता का माप करना या उसकी थाह पाना अत्यंत कठिन है। उन्होंने जिन मूल्यों की भविष्य के संदर्भ में स्थापना की, उसे तत्कालीन युग ने स्वीकार करने में आनाकानी की, पर सत्य तो सत्य ही रहेगा।
आचार्य भिक्षु अपने युग के धर्म-दिशादर्शक थे। ऐसे तेरापंथ के प्रथम प्रवर की त्रिजन्म शताब्दी की संपन्नता पर आस्था का अर्घ्य समर्पित है।