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धर्मक्रान्ति के पुरोधा : आचार्य श्री भिक्षु
दुनिया उसी को याद करती है जो दूसरों के लिए जीता है। कोई भी व्यक्ति जन्म से नहीं, बल्कि अपने विशिष्ट व्यक्तित्व और कर्तृत्व से महान बनता है। आचार्य भिक्षु ने अपने कर्तृत्व से जो अमिट रेखाएं खींची, वे हजारों लोगों के लिए जीवन की पथ-प्रदर्शक बन गईं। उन्होंने अपने समय के धार्मिक समाज में व्याप्त मिथ्या मान्यताओं और रूढ़ियों के अंधकार को मिटाकर ज्ञान की नई रोशनी बिखेरी।
उन्होंने आध्यात्मिक एवं सामाजिक धरातल की भिन्नता का जो मौलिक चिंतन किया, वह अपने आप में विशिष्ट था। इसी कारण उनके विचारों की तुलना पाश्चात्य सुधारक मार्टिन लूथर किंग और जर्मनी के विख्यात दार्शनिक काण्ट से की जाती है। तेरापंथ के आद्यप्रवर्तक होने पर भी उनका चिंतन संपूर्ण मानव जाति के कल्याण के लिए था।
अनुशासन के पुरोधा पुरुष
आचार्यश्री भिक्षु ने तत्कालीन सामाजिक स्थिति को गहराई से परखकर यह अनुभव किया कि धर्मसंघ में अनुशासन और मर्यादाओं का होना नितांत जरूरी है। इसी लक्ष्य को ध्यान में रखकर उन्होंने साधु समाज के लिए एक सुदृढ़ संविधान बनाया।
आत्मानुशासन
उन्होंने अनुशासन को किसी पर थोपा नहीं, क्योंकि थोपा हुआ अनुशासन कभी कारगर नहीं होता। मर्यादाओं को बनाते समय उन्होंने अपने सहवर्ती संतों के विचारों को भी पूरा महत्व दिया।
अनाग्रही दृष्टिकोण
उन्होंने उदारतापूर्वक लिखा कि भविष्य में आने वाले आचार्य यदि चाहें तो काल परिस्थिति के अनुसार इन मर्यादाओं में संशोधन, परिवर्तन एवं संवर्धन कर सकते हैं।
आज के समय में जब अनुशासन की प्रणालियां क्षीण हो रही हैं और लोग मर्यादाओं की धज्जियां उड़ा रहे हैं, तेरापंथ धर्मसंघ में आचार्य श्री भिक्षु द्वारा करीब ढाई सौ वर्ष पूर्व खींची गई अनुशासन की रेखा का आज भी अक्षरसःपालन किया जाता है। उनकी इस दूरदर्शी व्यवस्था ने पूरे धर्मसंघ को आज तक एकसूत्र में बांधे रखा है।
श्रमनिष्ठ आत्मार्थी साधक
वर्तमान की सुविधावादी मनोवृत्ति के विपरीत आचार्य श्री भिक्षु ने श्रम और पुरुषार्थ को बहुत महत्व दिया। सतत्तर (77) वर्ष की अवस्था होने पर भी वे अपना कार्य स्वयं करते थे, जबकि उनके अनेक शिष्य उनकी सेवा में सदैव तत्पर रहते थे।
रात्रि जागरण का एक प्रेरक प्रसंग
आचार्य भिक्षु जब पाली में प्रवास कर रहे थे, तब रात्रि प्रवचन के बाद विजयचंद जी पटवा अपने साथी के साथ तत्व-चर्चा के लिए आए। चर्चा में ऐसा रस आया कि दोनों रातभर गहराई से तत्व समझते रहे और भोर में गुरु धारणा स्वीकार कर लौटे। जब सुबह प्रतिक्रमण के समय संतों ने आचार्य श्री से आश्चर्यचकित होकर पूछा— 'क्या आप सारी रात चर्चा ही करते रहे? आप कब विराजे?' तब आचार्य भिक्षु ने मंद-मंद मुस्कुराते हुए कहा— 'यह पूछो कि मैं सोया कब? जब किसी को सम्यक् दृष्टि मिलती है, तो रात्रि का जागना भी आनंद देने वाला होता है।'
उन्होंने श्रम को भार न मानकर निर्जरा का साधन माना। उनकी यह अप्रमत्त आत्मचेतना आज भी साधकों के लिए मील का पत्थर है।
अनासक्त योगी
योगी का अर्थ ही है संसार में रहकर भी अनासक्ति का जीवन जीना। आचार्य भिक्षु की जीवनशैली पूर्णतः अनासक्ति परक थी। संघबद्ध साधना करते हुए भी वे उसमें लिप्त नहीं थे। उन्होंने स्वयं लिखा: 'गण में रहूं निरदाव अकेलो'। उन्हें न संघ से आसक्ति थी, न शरीर से और न ही विचारों से। भंयकर गर्मी में नदी की तप्त बालू रेत में आतापना लेते हुए वे स्वयं को साधना की कसौटी पर कसते रहे। संत कबीर की तरह ही आचार्य भिक्षु ने भी अपनी आचार-प्रवणता और सिद्धांतवादिता को निष्कलंक बनाए रखा।
कुशल कवि एवं सफल साहित्यकार
संत कबीर, तुलसी, नानक की भांति कविसंत परंपरा में आचार्य भिक्षु का नाम अत्यंत आदर से लिया जाता है। उन्होंने भगवान महावीर के दर्शन को युगानुरूप साहित्य के माध्यम से जनता तक पहुंचाया।
१. वे भाषा के अनुगामी नहीं बने, बल्कि भाषा उनकी अनुगामी बनी।
२. राजस्थानी भाषा के इस समृद्ध साहित्यकार की कलम ने 38,000 पद्य प्रमाण साहित्य की रचना की, जिसमें इतिहास, दर्शन, आचार-विचार और तत्त्व बोध समाहित है।
३. उनके विचारों को गहराई से समझने के लिए आचार्य श्री महाप्रज्ञ जी द्वारा रचित पुस्तक 'भिक्षु विचार दर्शन' एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है।
दूरद्रष्टा संविधान निर्माता
आचार्य भिक्षु के दूरदर्शी चिंतन ने एक अनूठा संविधान बनाकर एकतंत्र में लोकतंत्र की स्थापना की। उन्होंने संघ की सुरक्षा और एकता के लिए जो नियम बनाए, उसे बिना किसी भय या प्रलोभन के सबने सहर्ष स्वीकार किया।
उनका दिया हुआ 'संविभाग एवं समानता' का सूत्र आदर्श समाजवाद का प्रतीक है। उन्होंने विकास के लिए सबको अवसर दिया, तो गलती के परिष्कार के लिए प्रायश्चित का विधान भी किया।
जहां आज दुनिया में सत्ता और पद के लिए संघर्ष होता है, वहीं तेरापंथ धर्मसंघ में पद-प्राप्ति या अहंकार का कोई स्थान नहीं है।
भगवान महावीर के परम पथ-अनुगामी, पुरुषार्थ के प्रतीक और तप की तेजस्विता से परिपूर्ण आचार्य श्री भिक्षु को अनंत-अनंत श्रद्धा समर्पण!