आचार्य भिक्षु दिव्य पुरुष थे

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मुनि कमलकुमार

आचार्य भिक्षु दिव्य पुरुष थे

आचार्य भिक्षु एक दिव्य पुरुष थे। उनका जीवन अहिंसा, संयम और तप से परिपूर्ण था। बाल्यकाल से ही वे प्रतिभावान थे। स्कूल में उन्होंने महाजनी विद्या पढ़ी, परंतु साधु-संतों के सम्पर्क में रहने के कारण वे जैन तत्वों के अच्छे ज्ञाता बन गये। साधु-संतों की संगति से साधना के प्रति उनका मनोभाव बनता रहा। शादी के बाद भी आपका साधना के प्रति आकर्षण बढ़ता रहा। एक पुत्री होने के बाद आप पूर्ण विरक्त होकर रहने लगे। आपकी धर्मपत्नी सुगुणी के मन पर भी आपके वैराग्य का अच्छा प्रभाव पड़ा और दोनों ही रात्रि-भोजन के त्याग (परिहार) के साथ ब्रह्मचर्य और एकांतर तपस्या में लग गये। दोनों ही गुप्त रूप से साधुत्व की तैयारी में लीन हो गए।
परन्तु सुगुणी बाई का अकस्मात स्वर्गवास हो गया। अब तो आपका मन इतना सुदृढ़ हो गया कि उन्होंने सोचा—'आयुष्य का कोई पता नहीं, कहीं मैं साधुत्व से वंचित न रह जाऊँ।' भिक्षु ने माता से दीक्षा की अनुमति मांगी, परंतु माता मोहातुर होकर बोलीं, 'मैं तुम्हारी पुनः शादी करूँगी। तुम्हारे जन्म से पूर्व मुझे सिंह का सपना आया था। सिंह-स्वप्न से जन्मा बालक पराक्रमी होता है; वह बहुत बड़ा आदमी या राजा बनता है।' भिक्षु ने सोचा— 'माता की आज्ञा के बिना दीक्षा कैसे हो?' तब उन्होंने पूज्य रघुनाथ जी से सारी बात कही। पूज्य रघुनाथ जी माता को समझाने पधारे और युक्तिपूर्वक माता को समझाकर दीक्षा की अनुमति दिलवाई।
भिक्षु की दीक्षा वि. सं. १८०८ में बगड़ी नगर में नदी के किनारे वट वृक्ष की सघन छाया में हुई और पूज्य रघुनाथ जी ने उस समय यह आशीर्वाद प्रदान किया कि 'इस वट वृक्ष की तरह तेरा भी विस्तार हो।'
भिक्षु इस अयाचित आशीर्वाद को प्राप्त कर उसे सफल बनाने में तत्पर हो गये। उन्होंने आगमों का तलस्पर्शी अध्ययन किया और उन्हें लगा कि हमारा जीवन आगम-वाणी के अनुकूल नहीं है। जब-जब भी वे अपनी जिज्ञासाएँ लेकर पूज्य-चरणों में उपस्थित होते, तब उनका समुचित समाधान नहीं हो पाता था; फिर भी उन्होंने अपना विनय-भाव वर्धमान (बनाए) ही रखा।
राजनगर के श्रावकों ने जब जयमल जी के शिष्यों से आगम की बातें सुनीं, तब उनका मन पूज्य रघुनाथ जी के टोले से हटने लगा। यह बात जब पूज्य प्रवर ने सुनी, तब भिक्षु को राजनगर के श्रावकों के सम्मुख प्रतिबोध देने भेजा। राजनगर के श्रावक भिक्षु स्वामी के आचार, विचार और तपस्या के प्रति नतमतस्क थे। उन्होंने अपनी जिज्ञासाएँ भिक्षु के चरणों में प्रस्तुत कीं। भिक्षु स्वामी के हृदय में भी वे जिज्ञासाएँ पहले से ही उभर रही थीं, परंतु भिक्षु स्वामी ने गुरु का महत्त्व समझते हुए उनका समुचित उत्तर नहीं दिया और सोचा कि गुरु-चरणों में पहुँचकर ही इसका समाधान करेंगे।
परन्तु उसी रात्रि में भिक्षु को भयंकर ज्वर (बुखार) आ गया। भिक्षु ने सोचा— 'अगर इस समय आयुष्य पूर्ण हो गया, तो मेरी सद्गति कठिन है।' उन्होंने संकल्प किया कि 'अगर मेरा ज्वर शांत हो जाए, तो मैं श्रावकों को सारी स्थिति स्पष्ट कर दूँगा।' उनका ज्वर तत्काल शांत हो गया। सुबह उन्होंने श्रावकों के सामने सारी स्थिति स्पष्ट की। चातुर्मास के बाद गुरु दर्शन कर सारी स्थिति सामने रखी, परंतु समुचित समाधान नहीं मिला।
लगभग दो वर्षों के बाद वि. सं. १८१७ चैत्र सुदी नवमी के दिन बगड़ी नगर से अभिनिष्क्रमण (गृहत्याग) किया। भयंकर संघर्षों के बाद भी आपका मनोबल सुदृढ़ रहा। वि. सं. १८१७ आषाढ़ सुदी नवमी को उन्होंने भाव-दीक्षा स्वीकार की। कुछ वर्षों तक साध्वियों की दीक्षा नहीं हुई। वि. सं. १८२१ में तीन बहनों की दीक्षा हुई, फिर तो समय-समय पर दीक्षाएँ होती रहीं। वि. सं. १८३२ में प्रथम 'मर्यादा पत्र' लिखा गया और अपने उत्तराधिकारी की घोषणा कर दी गई, जिससे चारों तीर्थों में अच्छा उत्साह दृष्टिगोचर हुआ।
आचार्य भिक्षु एक निर्भीक और आत्मार्थी संत थे। उनके द्वारा चलाया गया यह पंथ देश-विदेश में फैल गया। उनकी जन्म-त्रिशताब्दी (३००वीं जयंती) पर उनके नवम पट्टधर महातपस्वी, महामनस्वी आचार्य श्री महाश्रमण जी (वर्तमान में आचार्य महाश्रमण जी ग्यारहवें पट्टधर हैं, यह संदर्भ तत्कालीन पट्टधर का है) ने 'भिक्षु चेतना वर्ष' की जो कल्पना की, वह अपने आप में अद्वितीय, अनुपम और संघ-प्रभावक रही।
पूज्य प्रवर ने भिक्षु-रचित ग्रंथों का समुचित परायण करके जन-जन को भिक्षुमय बना दिया। वर्षभर स्थान-स्थान पर कार्यशालाएँ चलीं, जिनमें आचार्य भिक्षु के सिद्धांतों को गहराई से समझाया गया।
इन कार्यशालाओं के माध्यम से आबाल-वृद्ध (बच्चे से लेकर बूढ़े तक) भिक्षु स्वामी के सिद्धांतों से परिचित हो सके, जिससे लोगों के मन में भिक्षु स्वामी के प्रति गहरी आस्था का जागरण हुआ है।