'कहाँ है वो शाश्वत धाम, जहाँ कोई दुःख छू भी नहीं सकता?' : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

लाडनूं। 20 जुलाई, 2026

'कहाँ है वो शाश्वत धाम, जहाँ कोई दुःख छू भी नहीं सकता?' : आचार्यश्री महाश्रमण

तीर्थंकर के प्रतिनिधि आचार्यश्री महाश्रमण जी ने जैन विश्व भारती परिसर स्थित विशाल सुधर्मा सभा में ‘शाश्वत वास का स्थान’ विषय पर पावन पाथेय प्रदान किया। पूज्य प्रवर ने शारीरिक व मानसिक दुःखों के मर्म को समझाते हुए मोक्ष रूपी शाश्वत स्थान की महत्ता पर प्रकाश डाला।
दुःख दो प्रकार के: शारीरिक और मानसिक समाधि का महत्व–
१. शारीरिक कष्ट और बीमारियाँ: आचार्यप्रवर ने फरमाया कि संसार में मनुष्य, पशु, स्थावर और विकलेन्द्रिय आदि सभी जीवों के शरीर में कष्ट और कठिनाइयाँ आती हैं। बीमारियों के कारण लोगों को डॉक्टर और अस्पताल का सहारा लेना पड़ता है।
२. मानसिक दुःख व अवसाद: शरीर स्वस्थ होने पर भी पद का वियोग, पदावनति या प्रिय वस्तु/व्यक्ति के बिछड़ने से मन दुःखी हो जाता है। तात्त्विक भाषा में यह 'आर्त्त ध्यान' है, जो व्यक्ति को अवसाद (डिप्रेशन) में धकेल देता है।
३. मनोबल रखें मजबूत : पूज्य प्रवर ने सीख दी कि यदि शरीर में कोई समस्या हो, लेकिन मन में शांति और समाधि बनी रहे तो यह श्रेष्ठ बात है। तन और मन दोनों में अशांति होना खतरनाक है, इसलिए शारीरिक कष्ट में भी मनोबल मजबूत रखना चाहिए।
लोकाग्र स्थित मोक्ष ही है असली 'शाश्वत स्थान'–
१. जहाँ आधि-व्याधि और बुढ़ापा नहीं : शास्त्रों का हवाला देते हुए आचार्यश्री ने बताया कि सृष्टि में एक ऐसा क्षेम, शिव और अनाबाध स्थान है जो लोक के अग्र भाग में
स्थित है—वही 'मोक्ष' है। वहाँ न बुढ़ापा है, न शारीरिक वेदना और न कोई बीमारी।
२. ४५ लाख योजन का क्षेत्र : भवसागर का अंत करने वाले मुनि आठों कर्मों से मुक्त होकर इस स्थान को प्राप्त करते हैं।
४५ लाख योजन के इस क्षेत्र में अनंत सिद्ध आत्माएँ समा जाती हैं। वहाँ पहुँचने के बाद जीव को पुनः संसार में नहीं आना पड़ता।