गुरुवाणी/ केन्द्र
'मौत की गारंटी पक्की है! लाइफ इंश्योरेंस नहीं, धर्म का प्रीमियम ही बचाएगा' : आचार्यश्री महाश्रमण
अखण्ड परिव्राजक, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण जी ने प्रातःकालीन मुख्य प्रवचन कार्यक्रम में सुधर्मा सभा को अपने पावन वचनामृत से सिंचित किया। आज के विशेष विषय ’’बुढ़ापा, मृत्यु से कैसे बचें’’ को उत्तरज्झयणाणि आगम के गूढ़ रहस्यों के माध्यम से पूज्य प्रवर ने अत्यंत सरल और मर्मस्पर्शी ढंग से समझाया।
संसार का भयंकर वेग: कहाँ मिलेगी जीव को सच्ची शरण?
१. महाउदक का बहाव: आचार्यप्रवर ने फरमाया कि यह संसार पानी के एक बहुत बड़े और तेज वेग (महाउदक) की तरह है, जिसमें सभी प्राणी बहे जा रहे हैं।
२. चार बड़े सवाल : इस तेज बहाव में बहते हुए जीवों के लिए सच्ची शरण क्या है? उनकी गति, प्रतिष्ठा और सुरक्षित द्वीप कौन सा है? इन जलते हुए सवालों का जवाब आगम में विस्तार से दिया गया है।
बुढ़ापा और मृत्यु अनिवार्य, सिर्फ 'धर्म' ही है सुरक्षित द्वीप
१. मृत्यु सबकी निश्चित : हर जीव ने अनंत बार जन्म और मरण का चक्र पूरा किया है। जीवन में बुढ़ापा और शारीरिक कष्ट (जरा) आएं या न आएं, लेकिन मौत का आना हर प्राणी के लिए शत-प्रतिशत निश्चित है।
२. धर्म का मजबूत द्वीप : बुढ़ापे और मौत के इस थपेड़े से बचाने वाला एकमात्र सुरक्षित टापू 'धर्म' है। धर्म एक ऐसा द्वीप है जहाँ जरा, कष्ट और मृत्यु के वेग का कोई प्रवेश नहीं होता।
३. परम गति और मोक्ष : धर्म ही जीवों को दुःखों से मुक्ति दिलाकर मोक्ष तक ले जाता है। अरिहंत और सिद्ध भी इसी धर्म की साधना से बनते हैं, इसलिए मूल शरण केवल 'केवली प्रज्ञप्त धर्म' ही है।
साधुओं के चेहरों पर दिखने वाले आध्यात्मिक आनंद का असली राज
१. कठोर जीवन में भी प्रसन्नता: साधु संत तमाम भौतिक सुख-सुविधाओं को छोड़कर बेहद कष्टमयी और कठोर जीवन जीते हैं, फिर भी उनके चेहरों पर हमेशा अलौकिक शांति और मुस्कान तैरती है।
२. वर्तमान में जीना : इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि साधना में लीन साधु न तो अतीत (पास्ट) की पुरानी स्मृतियों में खोए रहते हैं और न ही भविष्य (फ्यूचर) की चिंता करते हैं। वे पूरी तरह आज यानी वर्तमान में जीते हैं।
३. चिंता नहीं, चिंतन : साधु कभी किसी बात की फालतू चिंता नहीं करते, बल्कि आत्म-चिंतन करते हैं। पूरी तरह संतोष में रहने के कारण उनके भीतर से आध्यात्मिक आनंद फूटता है।
गृहस्थों के लिए सुखमय जीवन का अचूक महामंत्र
१. अनावश्यक यादों से बचें : पूज्य प्रवर ने गृहस्थों को सीख देते हुए कहा कि आम आदमी को भी अतीत की फालतू यादों और भविष्य की अंधी आकांक्षाओं से जितना हो सके, दूर रहना चाहिए।
२. मध्यस्थ भाव और संतोष: अगर सांसारिक जीवन में सुखी रहना है, तो परिस्थितियों के बीच मध्यस्थ भाव (न्यूट्रल) रखकर संतोष के साथ जीने का अभ्यास आज से ही शुरू कर देना चाहिए।