गुरुवाणी/ केन्द्र
'प्रमाद और हंसी-मजाक से खाली होता है पुण्य का बैंक' : आचार्यश्री महाश्रमण
जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, अहिंसा यात्रा प्रणेता, शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमण जी ने प्रातःकालीन मुख्य प्रवचन कार्यक्रम में सुधर्मा सभा को पावन प्रतिबोध प्रदान किया। आज के निर्धारित विषय ’’उत्तम जाति का घोड़ा’’ को उत्तरज्झयणाणि आगम में वर्णित ऐतिहासिक केशी-गौतम संवाद के माध्यम से पूज्य प्रवर ने अत्यंत मार्मिक ढंग से विवेचित किया।
विवेक ही जीवन का आधार : हंस की तरह करें करणीय का चयन–
१. अविवेक से बचें: आचार्यप्रवर ने फरमाया कि आदमी को सहसा बिना सोचे-समझे कोई कदम नहीं उठाना चाहिए। कार्य करने में हमेशा विवेक होना बहुत जरूरी है।
२. क्षीर-नीर सा न्याय: मनुष्य को उचित-अनुचित, हित-अहित और कर्तव्य-अकर्तव्य का पूरा ध्यान रखना चाहिए। जिस प्रकार हंस दूध और पानी को अलग कर देता है, वैसे ही मनुष्य को करणीय और अकरणीय का अंतर समझना चाहिए।
पुण्य की महिमा और साधु जीवन में प्रमाद का खतरा:
१. अनुकूलताओं का आधार: पुण्य के योग से मनुष्य को यश, कीर्ति, पद-प्रतिष्ठा और अनुकूलताएं मिलती हैं। पुण्य का थोड़ा अर्जन हो तो शरीर स्वस्थ रहता है और जीवन में सहयोग बना रहता है।
२. प्रमाद से पुण्य का क्षय: यदि कोई साधु अच्छे परिवार में जन्म लेकर छोटी उम्र में दीक्षित हो जाए, पर बाद में प्रमाद, हंसी-मजाक, विकथा और खान-पान में रस लेने लगे, तो उसका पुण्य कम हो जाता है।
३. संवर और निर्जरा ही धर्म: पूज्य प्रवर ने स्पष्ट किया कि पुण्य कोई बहुत बड़ी बात नहीं है, असली धर्म तो निर्जरा है। मोक्ष पाने के लिए हमें संवर और निर्जरा पर ही ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
स्वस्थ शरीर से ही संभव है साधना और लंबा विहार–
१. शरीर की उपयोगिता: साधु का शरीर यदि ठीक रहता है, तो वह सुचारू रूप से व्याख्यान दे सकता है, धर्म यात्राएं कर सकता है और श्रम उठा सकता है।
२. पुण्य की लालसा का निषेध: स्वस्थ शरीर होने पर वाणी सही रहती है और एक-दो घंटे तक व्याख्यान देना संभव होता है। इतना पुण्य रहने से साधना में सहयोग मिलता है, परंतु पुण्य की लालसा कभी नहीं रखनी चाहिए।
मन रूपी दुष्ट अश्व पर ज्ञान की अचूक लगाम–
१. उन्मार्ग पर ले जाता है मन: आगम के हवाले से आचार्यश्री ने फरमाया कि हमारा मन एक दुष्ट और भयंकर घोड़े की तरह है, जो बिना सोचे कहीं भी दौड़ लगा देता है। हर जीव इस पर सवार है और यह उसे गलत रास्ते पर ले जाता है।
२. श्रुत (ज्ञान) की लगाम: जो मनुष्य अपने मन रूपी दुष्ट घोड़े पर ज्ञान रूपी लगाम कसकर रखता है, वह कभी गलत रास्ते पर नहीं जाता। ज्ञान के बल पर ही इस दुष्ट अश्व को उत्तम जाति का घोड़ा बनाया जा सकता है।