भीतर संतोष का धन आते ही, संसार के सारे वैभव धूल हो जाते हैं : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

लाडनूं। 14 जुलाई, 2026

भीतर संतोष का धन आते ही, संसार के सारे वैभव धूल हो जाते हैं : आचार्यश्री महाश्रमण

जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अनुशास्ता, शांतिदूत, महातपस्वी आचार्य श्री महाश्रमण जी ने प्रातःकालीन मुख्य प्रवचन कार्यक्रम में सुधर्मा सभा को संबोधित किया। पूज्य प्रवर ने ‘भवतृष्णा का छेदन करें’ विषय पर अपनी ओजस्वी वाणी से प्रकाश डाला।
मनुष्य के हृदय में तृष्णा की बेल : विषफल देने वाली भवतृष्णा–
१. हृदय की अदृश्य लता : आचार्य प्रवर ने फरमाया कि हर मनुष्य के हृदय के भीतर एक ऐसी बेल फैली रहती है, जो जीवन में केवल विषतुल्य कड़वे फल ही पैदा करती है। यह घातक लता कुछ और नहीं, बल्कि हमारी 'भवतृष्णा' है।
२. लोभ और दुःख का कारण: तृष्णा का सीधा अर्थ है— जो हमारे पास नहीं है, उसे पाने की तीव्र इच्छा। यही लालसा मनुष्य के भीतर लोभ जगाती है और उसे जीवनभर अशांत रखती है।
इच्छाओं के दो रूप:प्रशस्त और अप्रशस्त का भेद–
१. प्रशस्त इच्छा (सच्चा पुरुषार्थ): वर्तमान में धर्मसंघ में 'योगक्षेम वर्ष' चल रहा है। इस संदर्भ में नया सद्ज्ञान पाना, स्वाध्याय, सेवा और साधना की इच्छा रखना प्रशस्त इच्छा है। यह इच्छा मनुष्य को ऊपर उठाती है।
२. अप्रशस्त इच्छा (संसार का बंधन): सांसारिक तृष्णा, भौतिक आकांक्षा और बाहरी चमक-दमक की लालसा रखना अप्रशस्त इच्छा है। यही बेल जीवन में केवल कड़वाहट और तनाव भरती है।
संतोष धन की महिमा : गृहस्थ जीवन में इच्छा-परिमाण व्रत–
१. संत जैसा गृहस्थ जीवन: आचार्यश्री ने फरमाया कि कई गृहस्थ ऐसे भी होते हैं जिनकी संयम चेतना साधुओं से भी अधिक होती है। वे गृहवास में रहकर भी संत जैसा मर्यादित जीवन जीते हैं।
२. व्यापार में पारदर्शिता : श्रावक के बारह व्रतों में पांचवां व्रत 'इच्छा परिमाण व्रत' (इच्छाओं की सीमा तय करना) है। गृहस्थों को अपने व्यापार-धंधे में भी पूरी ईमानदारी और पारदर्शिता रखनी चाहिए।
अणुव्रतों के पालन का आह्वान और मर्यादा–
१. इच्छाओं का परिसीमन : पूज्य प्रवर ने गृहस्थों को व्यावहारिक मार्ग दिखाते हुए कहा कि यदि कठिन महाव्रतों को स्वीकार करना संभव न हो, तो अणुव्रतों का यथासंभव पालन करें।
२. दैनिक चिंतन का नियम : मनुष्य को हर क्षण यह चिंतन रखना चाहिए कि वह अपने भीतर बैठी इस विषतुल्य भवतृष्णा को जितना हो सके कम करे और अपनी तृष्णाओं को सीमित करे।